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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 17

58 Sukta
20 Mantra
4/2/17
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒कर्मा॑णः सु॒रुचो॑ देव॒यन्तोऽयो॒ न दे॒वा जनि॑मा॒ धम॑न्तः। शु॒चन्तो॑ अ॒ग्निं व॑वृ॒धन्त॒ इन्द्र॑मू॒र्वं गव्यं॑ परि॒षद॑न्तो अग्मन् ॥१७॥

सु॒ऽकर्मा॑णः । सु॒ऽरुचः॑ । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । अयः॑ । न । दे॒वाः । जनि॑म । धम॑न्तः । शु॒चन्तः॑ । अ॒ग्निम् । व॒वृ॒धन्तः॑ । इन्द्र॑म् । ऊ॒र्वम् । गव्य॑म् । प॒रि॒ऽसद॑न्तः । अ॒ग्म॒न् ॥

Mantra without Swara
सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तोऽयो न देवा जनिमा धमन्तः। शुचन्तो अग्निं ववृधन्त इन्द्रमूर्वं गव्यं परिषदन्तो अग्मन् ॥

सुऽकर्माणः। सुऽरुचः। देवऽयन्तः। अयः। न। देवाः। जनिम। धमन्तः। शुचन्तः। अग्निम्। ववृधन्तः। इन्द्रम्। ऊर्वम्। गव्यम्। परिऽसदन्तः। अग्मन्॥१७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 2

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Meaning
हे राजा और प्रजाजन ! आप लोगों (अयः) सुवर्ण को (धमन्तः) कंपाते हुओं के (न) सदृश (देवाः) विद्वान् लोग (जनिम) जन्म की (देवयन्तः) कामना करते हुए (सुकर्माणः) जिनके उत्तम कर्म (सुरुचः) वा श्रेष्ठ प्रीति वह (शुचन्तः) पवित्र आचरण को करते और कराते हुए (अग्निम्) प्रसिद्ध अग्नि को (ववृधन्तः) बढ़ाते हैं (परिषदन्तः) और सभा का आचरण करते हुए (ऊर्वम्) हिंसा करनेवाली (इन्द्रम्) बिजुली को (गव्यम्) वाणीमय शास्त्र को (अग्मन्) प्राप्त होते हैं, वैसा ही आप लोग आचरण करो ॥१७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सब मनुष्यों को चाहिये कि धर्मयुक्त कर्मों को करके विद्या और सभा में प्रीति उत्पन्न करके पवित्रता की कामना करते हुए विद्या और जन्म से बढ़नेवाले बिजुली आदि की विद्या को बढ़ाते हुए चक्रवर्त्ती राज्य करके आनन्द का निरन्तर भोग करें ॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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