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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 1

58 Sukta
11 Mantra
4/19/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा त्वामि॑न्द्र वज्रि॒न्नत्र॒ विश्वे॑ दे॒वासः॑ सु॒हवा॑स॒ ऊमाः॑। म॒हामु॒भे रोद॑सी वृ॒द्धमृ॒ष्वं निरेक॒मिद्वृ॑णते वृत्र॒हत्ये॑ ॥१॥

ए॒व । त्वाम् । इ॒न्द्र॒ । व॒ज्रि॒न् । अत्र॑ । विश्वे॑ । दे॒वासः॑ । सु॒ऽहवा॑सः । ऊमाः॑ । म॒हाम् । उ॒भे इति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । वृ॒द्धम् । ऋ॒ष्वम् । निः । एक॑म् । इत् । गृ॒ण॒ते॒ । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ ॥

Mantra without Swara
एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र विश्वे देवासः सुहवास ऊमाः। महामुभे रोदसी वृद्धमृष्वं निरेकमिद्वृणते वृत्रहत्ये ॥

एव। त्वाम्। इन्द्र। वज्रिन्। अत्र। विश्वे। देवासः। सुऽहवासः। ऊमाः। महाम्। उभे इति। रोदसी इति। वृद्धम्। ऋष्वम्। निः। एकम्। इत्। वृणते। वृत्रऽहत्ये ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 1

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Meaning
हे (वज्रिन्) प्रशंसित शस्त्र और अस्त्र से युक्त (इन्द्र) शत्रुओं के विदीर्ण करनेहारे (अत्र) इस संसार में जो (ऊमाः) रक्षा आदि करनेवाले (सुहवासः) उत्तम प्रकार पुकारनेवाले (विश्वे) सब (देवासः) विद्वान् लोग (महाम्) बड़े (वृद्धम्) सब से विस्तीर्ण (ऋष्वम्) श्रेष्ठ (एकम्) अद्वितीय (त्वाम्) (त्वाम्) आपको (एवा) ही (वृत्रहत्ये) मेघ के नाश के सदृश शत्रु का नाश जिस संग्राम में उसमें (उभे) दोनों (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी सूर्य्य के सदृश (इत्) ही (निः, वृणते) स्वीकार करते हैं, उन्हीं की आप सेवा करिये ॥१॥
Essence
जो विद्वान् लोग अतिश्रेष्ठ गुणवाले राजा को स्वीकार करें, वे ही पूर्ण सुखवाले होते हैं ॥१॥
Subject
अब तृतीयाष्टक में छठे अध्याय का और ग्यारह ऋचावाले उन्नीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों का उपदेश करते हैं ॥१॥

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