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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 12

58 Sukta
21 Mantra
4/17/12
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
किय॑त्स्वि॒दिन्द्रो॒ अध्ये॑ति मा॒तुः किय॑त्पि॒तुर्ज॑नि॒तुर्यो ज॒जान॑। यो अ॑स्य॒ शुष्मं॑ मुहु॒कैरिय॑र्ति॒ वातो॒ न जू॒तः स्त॒नय॑द्भिर॒भ्रैः ॥१२॥

किय॑त् । स्वि॒त् । इन्द्रः॑ । अधि॑ । ए॒ति॒ । मा॒तुः । किय॑त् । पि॒तुः । ज॒नि॒तुः । यः । ज॒जान॑ । यः । अ॒स्य॒ । शुष्म॑म् । मु॒हु॒कैः । इय॑र्ति । वातः॑ । न । जू॒तः । स्त॒नय॑त्ऽभिः । अ॒भ्रैः ॥

Mantra without Swara
कियत्स्विदिन्द्रो अध्येति मातुः कियत्पितुर्जनितुर्यो जजान। यो अस्य शुष्मं मुहुकैरियर्ति वातो न जूतः स्तनयद्भिरभ्रैः ॥

कियत्। स्वित्। इन्द्रः। अधि। एति। मातुः। कियत्। पितुः। जनितुः। यः। जजान। यः। अस्य। शुष्मम्। मुहुकैः। इयर्ति। वातः। न। जूतः। स्तनयत्ऽभिः। अभ्रैः ॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 2

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Meaning
(यः) जो (मुहुकैः) बारंबार कार्य्य करनेवालों से (अस्य) इसके (शुष्मम्) बल को (स्तनयद्भिः) शब्द करते हुए (अभ्रैः) मेघों के साथ (जूतः) वेग को प्राप्त (वातः) वायु के (न) तुल्य विजय को (इयर्ति) प्राप्त होता है और (यः) जो (स्वित्) कोई (इन्द्रः) तेजस्वी (मातुः) माता का (कियत्) कितना और (जनितुः) उत्पन्न करनेवाले (पितुः) पिता का (कियत्) कितना उपकार (अधि, एति) स्मरण करता है, वही राजा (जजान) होता है ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य माता और पिता का कितना उपकार है, ऐसा जानकर प्रत्युपकार करते हैं, वे मेघ और वायु से प्रेरित बिजुली के सदृश बल को प्राप्त होकर बारंबार शत्रुओं को जीतकर प्रकट यशवाले होते हैं ॥१२॥
Subject
अब प्रजाजनों में किसकी राज्य की योग्यता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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