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Rigveda Mandal 4 / Sukta 15 / Mantra 5

58 Sukta
10 Mantra
4/15/5
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अस्य॑ घा वी॒र ईव॑तो॒ऽग्नेरी॑शीत॒ मर्त्यः॑। ति॒ग्मज॑म्भस्य मी॒ळ्हुषः॑ ॥५॥

अस्य॑ । घ॒ । वी॒रः । ईव॑तः । अ॒ग्नेः । ई॒शी॒त॒ । मर्त्यः॑ । ति॒ग्मऽज॑म्भस्य । मी॒ळ्हुषः॑ ॥

Mantra without Swara
अस्य घा वीर ईवतोऽग्नेरीशीत मर्त्यः। तिग्मजम्भस्य मीळ्हुषः ॥

अस्य। घ। वीरः। ईवतः। अग्नेः। ईशीत। मर्त्यः। तिग्मऽजम्भस्य। मीळ्हुषः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 15 Mantra » 5

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Meaning
हे राजन् ! जो (वीरः) वीर (मर्त्यः) मनुष्य (अग्नेः) अग्नि के सदृश (अस्य) इस (ईवतः) श्रेष्ठ गमन करनेवाले (तिग्मजम्भस्य) तीक्ष्ण तेजस्वि मुख जिसका उस (मीळ्हुषः) पराक्रमी सेनापति के शत्रुओं के मध्य में (ईशीत) समर्थ हो (घ) वही विजय करने योग्य होवे ॥५॥
Essence
सेनापति को चाहिये कि उन्हीं पुरुषों को सेना में भर्ती करें कि जो लोग शत्रुओं को जीत सकें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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