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Rigveda Mandal 4 / Sukta 15 / Mantra 1

58 Sukta
10 Mantra
4/15/1
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्होता॑ नो अध्व॒रे वा॒जी सन्परि॑ णीयते। दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियः॑ ॥१॥

अ॒ग्निः । होता॑ । नः॒ । अ॒ध्व॒रे । वा॒जी । सन् । परि॑ । नी॒य॒ते॒ । दे॒वः । दे॒वेषु॑ । य॒ज्ञियः॑ ॥

Mantra without Swara
अग्निर्होता नो अध्वरे वाजी सन्परि णीयते। देवो देवेषु यज्ञियः ॥

अग्निः। होता। नः। अध्वरे। वाजी। सन्। परि। नीयते। देवः। देवेषु। यज्ञियः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 15 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (नः) हम लोगों के (अध्वरे) व्यवहार में (अग्निः) अग्नि के सदृश उत्तम गुणों से प्रकाशित (होता) धारण करनेवाला (देवेषु) प्रकाशमानों में (देवः) प्रकाशमान (यज्ञियः) यज्ञ के योग्य (वाजी) बलवान् अश्व के समान (सन्) होता हुआ अग्नि (परि, नीयते) प्राप्त किया जाता है, वह आप लोगों से भी प्राप्त होने योग्य है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सूर्य्यरूप से सब व्यवहारों को प्राप्त कराता है, वैसे ही विद्वान् सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त कराता है ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले पन्द्रहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निविषय को कहते हैं ॥

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