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Rigveda Mandal 4 / Sukta 14 / Mantra 2

58 Sukta
5 Mantra
4/14/2
Devata- अग्निर्लिङ्गोक्ता वा Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वं के॒तुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रे॒ज्ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृ॒ण्वन्। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षं॒ वि सूर्यो॑ र॒श्मिभि॒श्चेकि॑तानः ॥२॥

ऊ॒र्ध्वम् । के॒तुम् । स॒वि॒ता । दे॒वः । अ॒श्रे॒त् । ज्योतिः॑ । विश्व॑स्मै । भुव॑नाय । कृ॒ण्वन् । आ । अ॒प्राः॒ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । अ॒न्तरि॑क्षम् । वि । सूर्यः॑ । र॒श्मिऽभिः॑ । चेकि॑तानः ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वं केतुं सविता देवो अश्रेज्ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन्। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं वि सूर्यो रश्मिभिश्चेकितानः ॥

ऊर्ध्वम्। केतुम्। सविता। देवः। अश्रेत्। ज्योतिः। विश्वस्मै। भुवनाय। कृण्वन्। आ। अप्राः। द्यावापृथिवी इति। अन्तरिक्षम्। वि। सूर्यः। रश्मिऽभिः। चेकितानः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 2

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Meaning
जो (देवः) विद्वान् जैसे (सविता) सूर्य्य (रश्मिभिः) किरणों से (चेकितानः) जनाता हुआ (सूर्य्यः) प्रकाशमान (विश्वस्मै) सब (भुवनाय) संसार के लिये (ज्योतिः) प्रकाश को (कृण्वन्) करता हुआ (द्यावापृथिवी) प्रकाश-भूमि (अन्तरिक्षम्) आकाश को (वि, आ, अप्राः) व्याप्त होता है, वैसे (ऊर्ध्वम्) उत्तम (केतुम्) ) बुद्धि का (अश्रेत्) आश्रय करे, वही पूर्ण सुखवाला होवे ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़कर, ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास से ज्ञान को प्राप्त होकर, किरणों से सूर्य्य के सदृश जनों के अन्तःकरणों को उपदेश से उज्ज्वल करते हैं, वे ही सब को सत्कार करने योग्य होते हैं ॥२॥
Subject
अब विद्वान् के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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