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Rigveda Mandal 3 / Sukta 7 / Mantra 6

62 Sukta
11 Mantra
3/7/6
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒तो पि॒तृभ्यां॑ प्र॒विदानु॒ घोषं॑ म॒हो म॒हद्भ्या॑मनयन्त शू॒षम्। उ॒क्षा ह॒ यत्र॒ परि॒ धान॑म॒क्तोरनु॒ स्वं धाम॑ जरि॒तुर्व॒वक्ष॑॥

उ॒तो इति॑ । पि॒तृऽभ्या॑म् । प्र॒ऽविदा॑ । अनु॑ । घोष॑म् । म॒हः । म॒हत्ऽभ्या॑म् । अ॒न॒य॒न्त॒ । शू॒षम् । उ॒क्षा । ह॒ । यत्र॑ । परि॑ । धान॑म् । अ॒क्तोः । अनु॑ । स्वम् । धाम॑ । ज॒रि॒तुः । व॒वक्ष॑ ॥

Mantra without Swara
उतो पितृभ्यां प्रविदानु घोषं महो महद्भ्यामनयन्त शूषम्। उक्षा ह यत्र परि धानमक्तोरनु स्वं धाम जरितुर्ववक्ष॥

उतो इति। पितृऽभ्याम्। प्रऽविदा। अनु। घोषम्। महः। महत्ऽभ्याम्। अनयन्त। शूषम्। उक्षा। ह। यत्र। परि। धानम्। अक्तोः। अनु। स्वम्। धाम। जरितुः। ववक्ष॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे ब्रह्मचारी लोग (महद्भ्याम्) पूज्य अध्यापक उपदेशकों से (महः) बड़े ब्रह्मचर्य्य को (उतो) और (पितृभ्याम्) माता-पिता के साथ (प्रविदा) प्रकृष्ट ज्ञान से (घोषम्) विद्याशिक्षायुक्त वाणी और (शूषम्) बल को (अनु, अनयन्त) अनुकूल प्राप्त हों (यत्र) जहाँ (उक्षा) सेवन करनेवाला सूर्य्य (अक्तोः) रात्रि के (परि, धानम्) सब ओर से धारण को (जरितुः) स्तुतिकर्ता के (ह) ही (स्वम्, धाम) अपने स्थान को अर्थात् प्राप्त अवस्था को (अनु, ववक्ष) पहुँचाता है उसका सत्कार करो ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे ब्रह्मचारी लोग पिता, आचार्य्य आदि महान् पुरुषों के सेवन से विद्यातेज को पाते हैं, वैसे तुम लोग प्रातःकाल ईश्वर की स्तुति आदि से धर्म से हुए सुख को प्राप्त होओ ॥६॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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