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Rigveda Mandal 3 / Sukta 57 / Mantra 1

62 Sukta
6 Mantra
3/57/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र मे॑ विवि॒क्वाँ अ॑विदन्मनी॒षां धे॒नुं चर॑न्तीं॒ प्रयु॑ता॒मगो॑पाम्। स॒द्यश्चि॒द्या दु॑दु॒हे भूरि॑ धा॒सेरिन्द्र॒स्तद॒ग्निः प॑नि॒तारो॑ अस्याः॥

प्र । मे॒ । वि॒वि॒क्वान् । अ॒वि॒द॒त् । म॒नी॒षाम् । धे॒नुम् । चर॑न्तीम् । प्रऽयु॑ताम् । अगो॑पाम् । स॒द्यः । चि॒त् । या । दु॒दु॒हे । भूरि॑ । धा॒सेः । इन्द्रः॑ । तत् । अ॒ग्निः । प॒नि॒तारः॑ । अ॒स्याः॒ ॥

Mantra without Swara
प्र मे विविक्वाँ अविदन्मनीषां धेनुं चरन्तीं प्रयुतामगोपाम्। सद्यश्चिद्या दुदुहे भूरि धासेरिन्द्रस्तदग्निः पनितारो अस्याः॥

प्र। मे। विविक्वान्। अविदत्। मनीषाम्। धेनुम्। चरन्तीम्। प्रऽयुताम्। अगोपाम्। सद्यः। चित्। या। दुदुहे। भूरि। धासेः। इन्द्रः। तत्। अग्निः। पनितारः। अस्याः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 1

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Meaning
जो (विविक्वान्) प्रकट मनुष्य (मे) मेरी (मनीषाम्) बुद्धि को (चरन्तीम्) प्राप्त होती हुई (प्रयुताम्) सङ्ख्यारहित बोधों से युक्त (धेनुम्) बछड़े को पालन करनेवाली गौ के सदृश वाणी को (प्र, अविदत्) प्राप्त हो और (या) जो (धासेः) प्राणों को धारण करनेवाले अन्न की (इन्द्रः) बिजुली के सदृश (अगोपाम्) अरक्षित को (भूरि) बहुत (सद्यः) शीघ्र (चित्) ही (दुदुहे) पूर्ण करता है (तत्) उस अन्न को (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्त्तमान पुरुष प्राप्त होवै (अस्याः) इस वाणी का (पनितारः) स्तुति वा व्यवहार करनेवाले उपदेश देवैं, उस वाणी को सब लोग प्राप्त हों ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग अधर्म के आचरण से रहित विद्या को ग्रहण करने की इच्छा पूरी करनेवाले उत्तम वाणी का प्रयोग करने और सत्यधर्म का आचरण करते हुए सबकी इच्छा को पूरी करते हैं, वे अत्यन्त सत्कार करने योग्य होवें ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले सत्तावनवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में वाणी के विषय को कहते हैं।

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