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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 3

62 Sukta
22 Mantra
3/55/3
Devata- विश्वेदेवा, अग्निः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि मे॑ पुरु॒त्रा प॑तयन्ति॒ कामाः॒ शम्यच्छा॑ दीद्ये पू॒र्व्याणि॑। समि॑द्धे अ॒ग्नावृ॒तमिद्व॑देम म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

वि । मे॒ । पु॒रु॒ऽत्रा । प॒त॒य॒न्ति॒ । कामाः॑ । शमि॑ । अच्छ॑ । दी॒द्ये॒ । पू॒र्व्या॑णि॑ । सम्ऽइ॑द्धे । अ॒ग्नौ । ऋ॒तम् । इत् । व॒दे॒म॒ । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
वि मे पुरुत्रा पतयन्ति कामाः शम्यच्छा दीद्ये पूर्व्याणि। समिद्धे अग्नावृतमिद्वदेम महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

वि। मे। पुरुऽत्रा। पतयन्ति। कामाः। शमि। अच्छ। दीद्ये। पूर्व्याणि। सम्ऽइद्धे। अग्नौ। ऋतम्। इत्। वदेम। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 3

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Meaning
जिनसे (मे) मेरी (पुरुत्रा) बहुत (कामाः) अभिलाषाएँ (पतयन्ति) स्वामी को स्पष्ट कहने की इच्छा करती हैं उन (पूर्व्याणि) पूर्वजनों से सिद्ध किये गये (शमि) कर्मों को मैं (अच्छ) उत्तम प्रकार (वि) विशेष करके (दीद्ये) प्रकाश करूँ (समिद्धे) प्रदीप्त (अग्नौ) अग्नि में जैसे (देवानाम्) उत्तम पदार्थों के मध्य में (महत्) बड़े (एकम्) सहायरहित (असुरत्वम्) प्राणों के आधार (ऋतम्) सत्य को (वदेम) कहे उसको (इत्) ही सब लोग कहें ॥३॥
Essence
मनुष्य लोग आलस्य को त्याग के पूर्व पुरुषों करके किये हुये कर्मों का सेवन देवों के देव सबके आधार सत्यस्वरूप और दीपक से घट आदि के सदृश भीतर व्याप्त परमात्मा को साक्षात् देख के अन्य जनों के प्रति उपदेश देवैं ॥३॥

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