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Rigveda Mandal 3 / Sukta 51 / Mantra 11

62 Sukta
12 Mantra
3/51/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- यवमध्यागायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यस्ते॒ अनु॑ स्व॒धामस॑त्सु॒ते नि य॑च्छ त॒न्व॑म्। स त्वा॑ ममत्तु सो॒म्यम्॥

यः । ते॒ । अनु॑ । स्व॒धाम् । अस॑त् । सु॒ते । नि । य॒च्छ॒ । त॒न्व॑म् । सः । त्वा॒ । म॒म॒त्तु॒ । सो॒म्यम् ॥

Mantra without Swara
यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्। स त्वा ममत्तु सोम्यम्॥

यः। ते। अनु। स्वधाम्। असत्। सुते। नि। यच्छ। तन्वम्। सः। त्वा। ममत्तु। सोम्यम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 6

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Meaning
हे राजन् ! (यः) जो (ते) आपके (सुते) उत्पन्न सोमलता के रस में (स्वधाम्) अन्न (अनु, असत्) पीछे होवे (सः) वह (त्वा) आपको (ममत्तु) आनन्द देवे और आप (तन्वम्) शरीर को (नियच्छ) ग्रहण कीजिये (सोम्यम्) सोमलता में उत्पन्न का पान आदि आचरण कीजिये ॥११॥
Essence
हे राजन् ! जो आपके अनुकूल और धर्मात्मा होकर प्रजाओं को आनन्दित करे, वह लक्ष्मीवान् से ऐश्वर्य को प्राप्त होवे और आप इन्द्रियजित् होकर प्रजाओं को सिद्ध कीजिये ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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