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Rigveda Mandal 3 / Sukta 38 / Mantra 2

62 Sukta
10 Mantra
3/38/2
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रजापतिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒नोत पृ॑च्छ॒ जनि॑मा कवी॒नां म॑नो॒धृतः॑ सु॒कृत॑स्तक्षत॒ द्याम्। इ॒मा उ॑ ते प्र॒ण्यो॒३॒॑ वर्ध॑माना॒ मनो॑वाता॒ अध॒ नु धर्म॑णि ग्मन्॥

इ॒ना । उ॒त । पृ॒च्छ॒ । जनि॑म । क॒वी॒नाम् । म॒नः॒ऽधृतः॑ । सु॒ऽकृतः॑ । त॒क्ष॒त॒ । द्याम् । इ॒माः । ऊँ॒ इति॑ । ते॒ । प्र॒ऽन्यः॑ । वर्ध॑मानाः । मनः॑ऽवाताः । अध॑ । नु । धर्म॑णि । ग्म॒न् ॥

Mantra without Swara
इनोत पृच्छ जनिमा कवीनां मनोधृतः सुकृतस्तक्षत द्याम्। इमा उ ते प्रण्यो३ वर्धमाना मनोवाता अध नु धर्मणि ग्मन्॥

इना। उत। पृच्छ। जनिम। कवीनाम्। मनःऽधृतः। सुऽकृतः। तक्षत। द्याम्। इमाः। ऊँ इति। ते। प्रऽन्यः। वर्धमानाः। मनःऽवाताः। अध। नु। धर्मणि। ग्मन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वान् वा साधारण मनुष्यो ! जो (कवीनाम्) बुद्धिमान् लोगों के (मनोधृतः) विज्ञान के धारण करने और (सुकृतः) उत्तम कर्म करनेवाले पुरुष (उ) और (इमाः) ये वर्त्तमान (प्रण्यः) उत्तम नीतियुक्त (वर्द्धमानाः) बढ़ती हुई (मनोवाताः) मन के सदृश वेगवाली स्त्रियाँ (धर्मणि) धर्म व्यवहार में (नु) शीघ्र (ग्मन्) प्राप्त हों (अध) इसके अनन्तर जो (द्याम्) बिजुली को प्राप्त हों और जो लोग (ते) तुम्हारे (जनिमा) जन्मों को प्राप्त हों उन स्त्रियों (उत) वा उन (इना) समर्थ पुरुषों को आप (पृच्छ) पूछिये और आप लोग भी अविद्या को (तक्षत) काटिये ॥२॥
Essence
जो पुरुष और स्त्रियाँ धर्म के अनुष्ठानपूर्वक बुद्धिमान् लोगों के लक्षणों को धारण कर प्रश्नोत्तर और अन्तःकरण को शुद्ध करके समर्थ होते हैं, वे पुरुष और वैसी स्त्रियाँ सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होती हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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