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Rigveda Mandal 3 / Sukta 37 / Mantra 2

62 Sukta
11 Mantra
3/37/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒र्वा॒चीनं॒ सु ते॒ मन॑ उ॒त चक्षुः॑ शतक्रतो। इन्द्र॑ कृ॒ण्वन्तु॑ वा॒घतः॑॥

अ॒र्वा॒चीन॑म् । सु । ते॒ । मनः॑ । उ॒त । चक्षुः॑ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । इन्द्र॑ । कृ॒ण्वन्तु॑ । वा॒घतः॑ ॥

Mantra without Swara
अर्वाचीनं सु ते मन उत चक्षुः शतक्रतो। इन्द्र कृण्वन्तु वाघतः॥

अर्वाचीनम्। सु। ते। मनः। उत। चक्षुः। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। इन्द्र। कृण्वन्तु। वाघतः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
हे (शतक्रतो) असंख्य बुद्धियुक्त (इन्द्र) दुष्ट पुरुषों के नाश करनेवाले ! जैसे (वाघतः) वाणी से दोषों के नाश करनेवाले बुद्धिमान् लोग (ते) आपके (अर्वाचीनम्) इस समय उत्तम शिक्षायुक्त (मनः) अन्तःकरण (उत) और (चक्षुः) नेत्र आदि इन्द्रिय को उत्तम गुणों से युक्त (सु, कृण्वन्तु) सिद्ध करैं वैसे ही आप आचरण करैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा आदि जन सदा यथार्थवक्ता पुरुष की शिक्षा में वर्त्तमान होके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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