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Rigveda Mandal 3 / Sukta 32 / Mantra 12

62 Sukta
17 Mantra
3/32/12
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य॒ज्ञो हि त॑ इन्द्र॒ वर्ध॑नो॒ भूदु॒त प्रि॒यः सु॒तसो॑मो मि॒येधः॑। य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑व य॒ज्ञियः॒ सन्य॒ज्ञस्ते॒ वज्र॑महि॒हत्य॑ आवत्॥

य॒ज्ञः । हि । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वर्ध॑नः । भूत् । उ॒त । प्रि॒यः । सु॒तऽसो॑मः । मि॒येधः॑ । य॒ज्ञेन॑ । य॒ज्ञम् । अ॒व॒ । य॒ज्ञियः॑ । सन् । य॒ज्ञः । ते॒ । वज्र॑म् । अ॒हि॒ऽहत्ये॑ । आ॒व॒त् ॥

Mantra without Swara
यज्ञो हि त इन्द्र वर्धनो भूदुत प्रियः सुतसोमो मियेधः। यज्ञेन यज्ञमव यज्ञियः सन्यज्ञस्ते वज्रमहिहत्य आवत्॥

यज्ञः। हि। ते। इन्द्र। वर्धनः। भूत्। उत। प्रियः। सुतऽसोमः। मियेधः। यज्ञेन। यज्ञम्। अव। यज्ञियः। सन्। यज्ञः। ते। वज्रम्। अहिऽहत्ये। आवत्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के प्राप्त करानेवाले ! (हि) जिससे कि (ते) आपका (अहिहत्ये) वर्षा का निमित्त (यज्ञः) पदार्थों का संयोग करनारूप व्यवहार (वर्धनः) उन्नतिकर्त्ता (सुतसोमः) ऐश्वर्य्य की उत्पत्तिकर्त्ता (मियेधः) दुःख का नाशकर्त्ता (उत) और भी (प्रियः) प्रीति की उत्पत्ति करनेवाला (भूत्) होता है जिन (ते) आपका (यज्ञः) पदार्थों का मेल करना रूप व्यवहार (वज्रम्) शस्त्रविशेष की (आवत्) रक्षा करे वह (यज्ञियः) यज्ञों में चतुर (सन्) हुए आप (यज्ञेन) सङ्गत कर्म से (यज्ञम्) सङ्गत व्यवहार की (अव) रक्षा करो ॥१२॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग जो उत्तम क्रिया से उत्तम क्रियाओं को बढ़ावैं तो आप लोग रक्षित हुए अन्य जनों की भी रक्षा करने के योग्य होवें ॥१२॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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