Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 31 / Mantra 12

62 Sukta
22 Mantra
3/31/12
Devata- इन्द्र: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पि॒त्रे चि॑च्चक्रुः॒ सद॑नं॒ सम॑स्मै॒ महि॒ त्विषी॑मत्सु॒कृतो॒ वि हि ख्यन्। वि॒ष्क॒भ्नन्तः॒ स्कम्भ॑नेना॒ जनि॑त्री॒ आसी॑ना ऊ॒र्ध्वं र॑भ॒सं वि मि॑न्वन्॥

पि॒त्रे । चि॒त् । च॒क्रुः॒ । सद॑नम् । सम् । अ॒स्मै॒ । महि॑ । त्विषि॑ऽमत् । सु॒ऽकृतः॑ । वि । हि । ख्यन् । वि॒ऽस्क॒भ्नन्तः॑ । स्कम्भ॑नेन । जनि॑त्री॒ इति॑ । आसी॑नाः । ऊ॒र्ध्वम् । र॒भ॒सम् । वि । मि॒न्व॒न् ॥

Mantra without Swara
पित्रे चिच्चक्रुः सदनं समस्मै महि त्विषीमत्सुकृतो वि हि ख्यन्। विष्कभ्नन्तः स्कम्भनेना जनित्री आसीना ऊर्ध्वं रभसं वि मिन्वन्॥

पित्रे। चित्। चक्रुः। सदनम्। सम्। अस्मै। महि। त्विषिऽमत्। सुऽकृतः। वि। हि। ख्यन्। विऽस्कभ्नन्तः। स्कम्भनेन। जनित्री इति। आसीनाः। ऊर्ध्वम्। रभसम्। वि। मिन्वन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 2

Bhashya

More bhashyas
Meaning
जो (सुकृतः) उत्तमधर्म सम्बन्धी कर्म करने और (विष्कभ्नन्तः) विशेष करके धारण करनेवाले महत्तत्त्व अर्थात् बुद्धि आदि की (जनित्री) उत्पन्न करनेवाली प्रकृति के सदृश (आसीनाः) स्थिर (स्कम्भनेन) धारण करने से (ऊर्ध्वम्) ऊँचे (रभसम्) वेग को (वि) (मिन्वन्) विशेष करके फेंकते और विद्या को (वि) (ख्यन्) प्रकाश करते वा (हि) जिसकारण (चित्) ही (अस्मै) इस (पित्रे) पालन करनेवाले के लिये (त्विषीमत्) बहुत कान्तियों से युक्त (महि) बड़े (सदनम्) स्थान को (सम्) (चक्रुः) सम्पन्न करें, वे कृतकृत्य विद्वान् होवें ॥१२॥
Essence
जैसे व्यापक प्रकृति के द्वारा महत्तत्त्व आदि को रचकर सम्पूर्ण जगत् को ईश्वर रचता है, वैसे ही विद्वान् जन पिता के सदृश वर्त्तमान होकर सम्पूर्ण जनों के लिये सुख धारण करते और पदार्थविद्या का प्रत्यक्ष अभ्यास करके शिक्षा देते हैं ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.