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Rigveda Mandal 3 / Sukta 29 / Mantra 7

62 Sukta
16 Mantra
3/29/7
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जा॒तो अ॒ग्नी रो॑चते॒ चेकि॑तानो वा॒जी विप्रः॑ कविश॒स्तः सु॒दानुः॑। यं दे॒वास॒ ईड्यं॑ विश्व॒विदं॑ हव्य॒वाह॒मद॑धुरध्व॒रेषु॑॥

जा॒तः । अ॒ग्निः । रो॒च॒ते॒ । चेकि॑तानः । वा॒जी । विप्रः॑ । क॒वि॒ऽश॒स्तः । सु॒ऽदानुः॑ । यम् । दे॒वासः॑ । ईड्य॑म् । वि॒श्व॒ऽविद॑म् । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । अद॑धुः । अ॒ध्व॒रेषु॑ ॥

Mantra without Swara
जातो अग्नी रोचते चेकितानो वाजी विप्रः कविशस्तः सुदानुः। यं देवास ईड्यं विश्वविदं हव्यवाहमदधुरध्वरेषु॥

जातः। अग्निः। रोचते। चेकितानः। वाजी। विप्रः। कविऽशस्तः। सुऽदानुः। यम्। देवासः। ईड्यम्। विश्वऽविदम्। हव्यऽवाहम्। अदधुः। अध्वरेषु॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 33 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (देवासः) विद्वान् लोग (अध्वरेषु) मेल करनेरूप व्यवहारों में (यम्) जिस (ईड्यम्) स्तुति करने योग्य (विश्वविदम्) सम्पूर्ण वस्तुओं के ज्ञाता (हव्यवाहम्) हवन करने योग्य पदार्थों के धारणकर्त्ता अग्नि को (अदधुः) धारण करें वह (चेकितानः) उत्तम कार्य्यों का जताने (सुदानुः) उत्तम प्रकार देनेवाला और (कविशस्तः) उत्तम पुरुषों से प्रशंसित हुए (विप्रः) बुद्धिमान् के सदृश (जातः) प्रकटता को प्राप्त (वाजी) वेगयुक्त (अग्निः) अग्नि (रोचते) प्रकाशित होता है ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली संबन्धी विद्या को सिद्ध करें, तो यह विद्या यथार्थवक्ता विद्वान् पुरुष के तुल्य सत्य और योग्य कार्य्यों को सिद्ध करे ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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