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Rigveda Mandal 3 / Sukta 21 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/21/4
Devata- अग्निः Rishi- गाथी कौशिकः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तुभ्यं॑ श्चोतन्त्यध्रिगो शचीवः स्तो॒कासो॑ अग्ने॒ मेद॑सो घृ॒तस्य॑। क॒वि॒श॒स्तो बृ॑ह॒ता भा॒नुनागा॑ ह॒व्या जु॑षस्व मेधिर॥

तुभ्य॑म् । श्चो॒त॒न्ति॒ । अ॒ध्रि॒गो॒ इत्य॑ध्रिऽगो । श॒ची॒ऽवः॒ । स्तो॒कासः॑ । अ॒ग्ने॒ । मेद॑सः । घृ॒तस्य॑ । क॒वि॒ऽश॒स्तः । बृ॒ह॒ता । भा॒नुना॑ । आ । अ॒गाः॒ । ह॒व्या । जु॒ष॒स्व॒ । मे॒धि॒र॒ ॥

Mantra without Swara
तुभ्यं श्चोतन्त्यध्रिगो शचीवः स्तोकासो अग्ने मेदसो घृतस्य। कविशस्तो बृहता भानुनागा हव्या जुषस्व मेधिर॥

तुभ्यम्। श्चोतन्ति। अध्रिगो इत्यध्रिऽगो। शचीऽवः। स्तोकासः। अग्ने। मेदसः। घृतस्य। कविऽशस्तः। बृहता। भानुना। आ। अगाः। हव्या। जुषस्व। मेधिर॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
हे (अध्रिगो) वेदमन्त्रों के ज्ञाता (शचीवः) प्रशंसनीय बुद्धियुक्त (मेधिर) बुद्धिमान् पुरुष ! (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशकारक जो पुरुष (स्तोकासः) उत्तम गुणों की स्तुतिकर्त्ता (मेदसः) चिकने (घृतस्य) घृत का (तुभ्यम्) तेरे लिये (श्चोतन्ति) सेचन करते उनके साथ (कविशस्तः) विद्वानों से प्रशंसित हुआ (बृहता) बड़े (भानुना) तेज से सूर्य के सदृश (आ) (अगाः) प्राप्त हो और (हव्या) देने योग्य वस्तुओं का (जुषस्व) सेवन करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल से सींच कर वृक्षों को बढ़ाय फल प्राप्त होते हैं, वैसे ही सत्सङ्ग से सत्पुरुषों का सेवन करके विज्ञान आदि फलों को प्राप्त करें ॥४॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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