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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 7

62 Sukta
15 Mantra
3/2/7
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ रोद॑सी अपृण॒दा स्व॑र्म॒हज्जा॒तं यदे॑नम॒पसो॒ अधा॑रयन्। सो अ॑ध्व॒राय॒ परि॑ णीयते क॒विरत्यो॒ न वाज॑सातये॒ चनो॑हितः॥

आ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पृ॒ण॒त् । आ । स्वः॑ । म॒हत् । जा॒तम् । यत् । ए॒न॒म् । अ॒पसः॑ । अधा॑रयन् । सः । अ॒ध्व॒राय॑ । परि॑ । नी॒य॒ते॒ । क॒विः । अत्यः॑ । न । वाज॑ऽसातये । चनः॑ऽहितः ॥

Mantra without Swara
आ रोदसी अपृणदा स्वर्महज्जातं यदेनमपसो अधारयन्। सो अध्वराय परि णीयते कविरत्यो न वाजसातये चनोहितः॥

आ। रोदसी इति। अपृणत्। आ। स्वः। महत्। जातम्। यत्। एनम्। अपसः। अधारयन्। सः। अध्वराय। परि। नीयते। कविः। अत्यः। न। वाजऽसातये। चनःऽहितः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वानों ! आप जैसे (चनोहितः) अन्न के लिये हित करानेवाला (वाजसातये) अन्नादि पदार्थों के विभाग करने को (अस्यः) जैसे व्याप्तिशील अर्थात् चालों में व्याप्ति रखनेवाला अश्व (न) वैसे (कविः) चञ्चल देखा जाए ऐसा अग्नि (रोदसी) आकाश और पृथिवी (आ, अपृणत्) अच्छेप्रकार पूर्ण करता है वा (यत्) जिस (महत्) बहुत (जातम्) उत्पन्न हुए (स्वः) सुख को (आ) अच्छे प्रकार परिपूर्ण करता है (सः) वह (अध्वराय) अहिंसारूप यज्ञ के लिये (परिणीयते) प्राप्त किया जाता है वैसे (एनम्) उक्त अग्नि को (अपसः) कर्म से (अधारयन्) धारण करें ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्युत् रूप अग्नि सूर्य पृथिवी उनमें स्थित और अन्तरिक्षस्थ पदार्थों को प्रकाशित करता है, यदि वह यानों में प्रयुक्त किया जाय तो सबका हितकारी हो ॥७॥
Subject
अब अग्नि विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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