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Rigveda Mandal 3 / Sukta 15 / Mantra 4

62 Sukta
7 Mantra
3/15/4
Devata- अग्निः Rishi- उत्कीलः कात्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अषा॑ळ्हो अग्ने वृष॒भो दि॑दीहि॒ पुरो॒ विश्वाः॒ सौभ॑गा संजिगी॒वान्। य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता प्र॑थ॒मस्य॑ पा॒योर्जात॑वेदो बृह॒तः सु॑प्रणीते॥

अषा॑ळ्हः । अ॒ग्ने॒ । वृ॒ष॒भः । दि॒दी॒हि॒ । पुरः॑ । विश्वाः॑ । सौभ॑गा । स॒म्ऽजि॒गी॒वान् । य॒ज्ञस्य॑ । ने॒ता । प्र॒थ॒मस्य॑ । पा॒योः । जात॑ऽवेदः । बृ॒ह॒तः । सु॒ऽप्र॒नी॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
अषाळ्हो अग्ने वृषभो दिदीहि पुरो विश्वाः सौभगा संजिगीवान्। यज्ञस्य नेता प्रथमस्य पायोर्जातवेदो बृहतः सुप्रणीते॥

अषाळ्हः। अग्ने। वृषभः। दिदीहि। पुरः। विश्वाः। सौभगा। सम्ऽजिगीवान्। यज्ञस्य। नेता। प्रथमस्य। पायोः। जातऽवेदः। बृहतः। सुऽप्रनीते॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 4

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Meaning
हे (सुप्रणीते) उत्कृष्टन्यायकारी (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (अषाळ्हः) दूसरे से नहीं पराजय के योग्य विद्वान् (वृषभः) बलवान् पुरुष ! आप (विश्वा) सम्पूर्ण (सौभगा) उत्तम ऐश्वर्यवाली (पुरः) नगरियों में (दिदीहि) धर्ममिश्रित कर्मों का प्रकाश कीजिये। हे (जातवेदः) सकलविद्यापूरित विद्वन् पुरुष ! (प्रथमस्य) प्रथमाश्रमब्रह्मचर्य्यरूप (पायोः) रक्षाकारक (बृहतः) श्रेष्ठ (यज्ञस्य) अहिंसा धर्म के (नेता) उत्तम रीति से निर्वाहक हुए और (सञ्जिगीवान्) उत्तम प्रकार जयशाली होइये ॥४॥
Essence
हे राजपुरुषो ! विद्या और विनय से सम्पूर्ण प्रजाओं को प्रसन्न तथा ब्रह्मचर्य्य आदि आश्रमों के निर्वाह से उनमें विद्या उत्तम शिक्षा श्रेष्ठता अतिकाल जीवन आदि बढ़ाय के ऐश्वर्य्यों का आधिक्य कीजिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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