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Rigveda Mandal 2 / Sukta 41 / Mantra 9

43 Sukta
21 Mantra
2/41/9
Devata- अश्विनौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता न॒ आ वो॑ळ्हमश्विना र॒यिं पि॒शङ्ग॑संदृशम्। धिष्ण्या॑ वरिवो॒विद॑म्॥

ता । नः॒ । आ । वो॒ळ्ह॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । र॒यिम् । पि॒शङ्ग॑ऽसन्दृशम् । धिष्ण्या॑ । व॒रि॒वः॒ऽविद॑म् ॥

Mantra without Swara
ता न आ वोळ्हमश्विना रयिं पिशङ्गसंदृशम्। धिष्ण्या वरिवोविदम्॥

ता। नः। आ। वोळ्हम्। अश्विना। रयिम्। पिशङ्गऽसन्दृशम्। धिष्ण्या। वरिवःऽविदम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (धिष्ण्या) शब्दायमान हों वा स्तुति किये जावें वे (अश्विना) सर्वत्र होनेवाले अग्नि और वायु (नः) हम लोगों के लिये (वरिवोविदम्) जिससे सेवा को प्राप्त होते वा (पिशङ्गसंदृशम्) सुन्दर वर्ण को देखते हैं उस (रयिम्) धन को (आ,वोढम्) अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं (ता) उनका उपदेश करो ॥९॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जिन अग्नि और वायु से पुष्कल धन को प्राप्त होते हैं, उनको यथावत् जानें ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं।

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