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Rigveda Mandal 2 / Sukta 4 / Mantra 8

43 Sukta
9 Mantra
2/4/8
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नू ते॒ पूर्व॒स्याव॑सो॒ अधी॑तौ तृ॒तीये॑ वि॒दथे॒ मन्म॑ शंसि। अ॒स्मे अ॑ग्ने सं॒यद्वी॑रं बृ॒हन्तं॑ क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ स्वप॒त्यं र॒यिं दाः॑॥

नु । ते॒ । पूर्व॑स्य । अव॑सः । अधि॑ऽइतौ । तृ॒तीये॑ । वि॒दथे॑ । मन्म॑ । शं॒सि॒ । अ॒स्मे इति॑ । अ॒ग्ने॒ । सं॒यत्ऽवी॑रम् । बृ॒हन्त॑म् । क्षु॒ऽमन्त॑म् । वाज॑म् । सु॒ऽअ॒प॒त्यम् । र॒यिम् । दाः॒ ॥

Mantra without Swara
नू ते पूर्वस्यावसो अधीतौ तृतीये विदथे मन्म शंसि। अस्मे अग्ने संयद्वीरं बृहन्तं क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दाः॥

नु। ते। पूर्वस्य। अवसः। अधिऽइतौ। तृतीये। विदथे। मन्म। शंसि। अस्मे इति। अग्ने। संयत्ऽवीरम्। बृहन्तम्। क्षुऽमन्तम्। वाजम्। सुऽअपत्यम्। रयिम्। दाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 3

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वान् जन ! (ते) आपकी (पूर्वस्य) पिछिली (अवसः) रक्षा सम्बन्ध के (अधीतौ) अध्ययन में (तृतीये) तीसरे (विदथे) संग्राम के निमित्त आप ही (मन्म) विज्ञान की (शंसि) स्तुति अर्थात् प्रशंसा करते हैं, वे आप (अस्मे) हम लोगों के लिये (संयद्वीरम्) जिसमें संयमयुक्त वीरजन विद्यमान (बृहन्तम्) जो बढ़ता हुआ है (क्षुमन्तम्) उस प्रंशसित अन्न और (स्वपत्यम्) उत्तम अपत्ययुक्त (वाजम्) पदार्थबोध और (रयिम्) धन को (नु) शीघ्र (दाः) दीजिये ॥८॥
Essence
हे विद्वान् ! जिस विद्या पढ़े हुए रक्षा करनेवाले के समीप से तृतीय सवन अर्थात् ब्रह्मचर्य के तीसरे भाग को शीघ्र पूर्ण कर लिये पीछे अग्न्यादि विद्यायें प्राप्त होकर उत्तम धन बल और प्रजावान् हम लोग हों, उसको आप बतलाइये ॥८॥
Subject
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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