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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 9

43 Sukta
11 Mantra
2/38/9
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न यस्येन्द्रो॒ वरु॑णो॒ न मि॒त्रो व्र॒तम॑र्य॒मा न मि॒नन्ति॑ रु॒द्रः। नारा॑तय॒स्तमि॒दं स्व॒स्ति हु॒वे दे॒वं स॑वि॒तारं॒ नमो॑भिः॥

न । यस्य॑ । इन्द्रः॑ । वरु॑णः । न । मि॒त्रः । व्र॒तम् । अ॒र्य॒मा । न । मि॒नन्ति॑ । रु॒द्रः । न । अरा॑तयः । तम् । इ॒दम् । स्व॒स्ति । हु॒वे । दे॒वम् । स॒वि॒तार॑म् । नमः॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
न यस्येन्द्रो वरुणो न मित्रो व्रतमर्यमा न मिनन्ति रुद्रः। नारातयस्तमिदं स्वस्ति हुवे देवं सवितारं नमोभिः॥

न। यस्य। इन्द्रः। वरुणः। न। मित्रः। व्रतम्। अर्यमा। न। मिनन्ति। रुद्रः। न। अरातयः। तम्। इदम्। स्वस्ति। हुवे। देवम्। सवितारम्। नमःऽभिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस जगदीश्वर के (व्रतम्) नियम को (न)(इन्द्रः) सूर्य्य और बिजली (न)(वरुणः) जल (न)(मित्रः) वायुः (न)(अर्य्यमा) द्वितीय प्रकार का नियन्ता धारक वायु (न)(रुद्रः) जीव (न)(अरातयः) शत्रुजन (मिनन्ति) नष्ट करते हैं (तम्) उस (इदम्) इस (स्वस्ति) सुखरूप (सवितारम्) समस्त जगत् के उत्पन्न करनेवाले (देवम्) दाता परमात्मा को (नमोभिः) सत्कर्मों से जैसे मैं (हुवे) स्तुति करुँ वैसे तुम भी प्रशंसा करो ॥९॥
Essence
इस संसार में कोई पदार्थ ईश्वर के तुल्य नहीं है तो अधिक कैसे हो और कोई भी इसके नियम का उल्लङ्घन नहीं कर सकता है, इस कारण सब मनुष्यों को उसी ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना और उपासना करना चाहिये ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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