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Rigveda Mandal 2 / Sukta 35 / Mantra 10

43 Sukta
15 Mantra
2/35/10
Devata- अपान्नपात् Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यरूपः॒ स हिर॑ण्यसंदृग॒पां नपा॒त्सेदु॒ हिर॑ण्यवर्णः। हि॒र॒ण्यया॒त्परि॒ योने॑र्नि॒षद्या॑ हिरण्य॒दा द॑द॒त्यन्न॑मस्मै॥

हिर॑ण्यऽरूपः । सः । हिर॑ण्यऽसन्दृक् । अ॒पाम् । नपा॑त् । सः । इत् । ऊँ॒ इति॑ । हिर॑ण्यऽवर्णः । हि॒र॒ण्यया॒त् । परि॑ । योनेः॑ । नि॒ऽसद्य॑ । हि॒र॒ण्य॒ऽदाः । द॒द॒ति॒ । अन्न॑म् । अ॒स्मै॒ ॥

Mantra without Swara
हिरण्यरूपः स हिरण्यसंदृगपां नपात्सेदु हिरण्यवर्णः। हिरण्ययात्परि योनेर्निषद्या हिरण्यदा ददत्यन्नमस्मै॥

हिरण्यऽरूपः। सः। हिरण्यऽसन्दृक्। अपाम्। नपात्। सः। इत्। ऊँ इति। हिरण्यऽवर्णः। हिरण्ययात्। परि। योनेः। निऽसद्य। हिरण्यऽदाः। ददति। अन्नम्। अस्मै॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 23 Mantra » 5

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Meaning
जो (हिरण्यदाः) वायु तेज देते हैं वे (अस्मै) इस प्राणी के लिये (अन्नम्) अन्न को (ददति) देते हैं (सः) वह (हिरण्यरूपः) तेजःस्वरूप (हिरण्यसंदृक्) तेज को दर्शाता (स,इत्,उ) वही (हिरण्यवर्णः) सुवर्ण के समान वर्णयुक्त (अपाम्,नपात्) जलों के बीच न गिरनेवाला (हिरण्ययात्) तेजःस्वरूप (योनेः) निज कारण से (परि,निषद्य) सब ओर से निरन्तर स्थिर हुआ अग्नि सबको पालन करता है ॥१०॥
Essence
जो अग्नि पवन से उत्पन्न हुआ समस्त पदार्थों को दिखानेवाला सब पदार्थों के भीतर रहता हुआ सर्वविद्याओं का निमित्त है, उसको जानकर प्रयोजन सिद्ध करना चाहिये ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगल मन्त्र में कहा है।

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