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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 15

43 Sukta
15 Mantra
2/34/15
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यया॑ र॒ध्रं पा॒रय॒थात्यंहो॒ यया॑ नि॒दो मु॒ञ्चथ॑ वन्दि॒तार॑म्। अ॒र्वाची॒ सा म॑रुतो॒ या व॑ ऊ॒तिरो षु वा॒श्रेव॑ सुम॒तिर्जि॑गातु॥

यया॑ । र॒ध्रम् । पा॒रय॑थ । अति॑ । अंहः॑ । यया॑ । नि॒दः । मु॒ञ्चथ॑ । व॒न्दि॒तार॑म् । अ॒र्वाची॑ । सा । म॒रु॒तः॒ । या । वः॒ । ऊ॒तिः । ओ इति॑ । सु । वा॒श्राऽइ॑व । सु॒ऽम॒तिः । जि॒गा॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
यया रध्रं पारयथात्यंहो यया निदो मुञ्चथ वन्दितारम्। अर्वाची सा मरुतो या व ऊतिरो षु वाश्रेव सुमतिर्जिगातु॥

यया। रध्रम्। पारयथ। अति। अंहः। यया। निदः। मुञ्चथ। वन्दितारम्। अर्वाची। सा। मरुतः। या। वः। ऊतिः। ओ इति। सु। वाश्राऽइव। सुऽमतिः। जिगातु॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे (मरुतः) मरणधर्मा मनुष्यो ! (या) जो (ऊतिः) रक्षा (सुमतिः) और सुन्दर बुद्धि (ओ) प्रेरणाओं में (वः) तुम लोगों की (वाश्रेव) मनोहर के समान (सुजिगातु) प्रशंसा करें वा (यया) जिससे (रध्रम्) अच्छे प्रकार की सिद्धि को (अतिपारयथ) अतीव पार पहुँचाओ और (अंहः) अपराध को निवृत्त करो वा (यया) जिससे (निदः) निन्दाओं को (मुञ्चथ) मोचो अर्थात् छोड़ो (सा) वह (अर्वाची) घोड़ों को प्राप्त होनेवाली कोई क्रिया (वन्दितारम्) वन्दना करनेवाले को प्राप्त हो ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य जिस क्रिया से अधर्म और निन्दा करनेवाले का त्याग और धर्म वा प्रशंसा करनेवाले का ग्रहण रक्षा बुद्धि की वृद्धि हो, उस क्रिया को निरन्तर करें अर्थात् सदा निन्दा का त्याग और स्तुति का स्वीकार करें ॥१५॥ इस सूक्त में विद्वान् और पवन के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥ यह चौतीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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