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Rigveda Mandal 2 / Sukta 33 / Mantra 6

43 Sukta
15 Mantra
2/33/6
Devata- रुद्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उन्मा॑ ममन्द वृष॒भो म॒रुत्वा॒न्त्वक्षी॑यसा॒ वय॑सा॒ नाध॑मानम्। घृणी॑व च्छा॒याम॑र॒पा अ॑शी॒या वि॑वासेयं रु॒द्रस्य॑ सु॒म्नम्॥

उत् । मा॒ । म॒म॒न्द॒ । वृ॒ष॒भः । म॒रुत्वा॑न् । त्वक्षी॑यसा । वय॑सा । नाध॑मानम् । घृणि॑ऽइव । छा॒याम् । अ॒र॒पाः । अ॒शी॒य॒ । वि॒वा॒से॒य॒म् । रु॒द्रस्य॑ । सु॒म्नम् ॥

Mantra without Swara
उन्मा ममन्द वृषभो मरुत्वान्त्वक्षीयसा वयसा नाधमानम्। घृणीव च्छायामरपा अशीया विवासेयं रुद्रस्य सुम्नम्॥

उत्। मा। ममन्द। वृषभः। मरुत्वान्। त्वक्षीयसा। वयसा। नाधमानम्। घृणिऽइव। छायाम्। अरपाः। अशीय। विवासेयम्। रुद्रस्य। सुम्नम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
जो (वृषभः) सुखों के वर्षानेवाले (मरुत्वान्) मनुष्य आदि बहुत प्रजाजनों से युक्त (अरपाः) अविद्यमानपाप-निष्पाप वैद्य (त्वक्षीयसा) प्रदीप्त (वयसा) आयु से (नाधमानम्) याचना किया हुआ (मा) मुझको (उत्,ममन्द) उत्तमता से चाहते हो उनकी उत्तेजना से मैं (घृणीव) सूर्य्य के समान (छायाम्) घर का (विवासेयम्) सेवन करूँ और (सुम्नम्) सुख को (आ,अशीव) अच्छे प्रकार प्राप्त करूँ ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वैद्य हमारे रोगों का निवारण कर मनुष्यों को दीर्घ आयुवाले करते हैं, वे सूर्य्य के समान प्रकाशित कीर्त्तिवाले होते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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