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Rigveda Mandal 2 / Sukta 31 / Mantra 3

43 Sukta
7 Mantra
2/31/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ॒त स्य न॒ इन्द्रो॑ वि॒श्वच॑र्षणिर्दि॒वः शर्धे॑न॒ मारु॑तेन सु॒क्रतुः॑। अनु॒ नु स्था॑त्यवृ॒काभि॑रू॒तिभी॒ रथं॑ म॒हे स॒नये॒ वाज॑सातये॥

उ॒त । स्यः । नः॒ । इन्द्रः॑ । वि॒श्वऽच॑र्षणिः । दि॒वः । शर्धे॑न । मारु॑तेन । सु॒ऽक्रतुः॑ । अनु॑ । नु । स्था॒ति॒ । अ॒वृ॒काभिः॑ । ऊ॒तिऽभिः॑ । रथ॑म् । म॒हे । स॒नये॑ । वाज॑ऽसातये ॥

Mantra without Swara
उत स्य न इन्द्रो विश्वचर्षणिर्दिवः शर्धेन मारुतेन सुक्रतुः। अनु नु स्थात्यवृकाभिरूतिभी रथं महे सनये वाजसातये॥

उत। स्यः। नः। इन्द्रः। विश्वऽचर्षणिः। दिवः। शर्धेन। मारुतेन। सुऽक्रतुः। अनु। नु। स्थाति। अवृकाभिः। ऊतिऽभिः। रथम्। महे। सनये। वाजऽसातये॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 14 Mantra » 3

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Meaning
(विश्वचर्षणिः) सबको दिखाने चितानेवाला (सुक्रतुः) उत्तम बुद्धि युक्त (इन्द्रः) सूर्य के तुल्य तेजस्वी सभापति (दिवः) जैसे प्रकाश से सूर्य शोभित हो वैसे (अवृकाभिः) चोर आदि दुष्टों से रहित (ऊतिभिः) रक्षा आदि से (मारुतेन) मनुष्यसम्बन्धी (शर्द्धेन) बल के साथ (महे) बड़े (सनये) सुख के सम्यक् विभाग के लिये और (वाजसातये) सङ्ग्राम के सम्यक् सेवने के लिये (नः) हमारे (रथम्) विमानादि यान का (अनु,स्थाति) अनुष्ठान करता है (स्यः) वह (उत) तो (नु) शीघ्र ऐश्वर्य्य को प्राप्त होता है ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपने प्रताप से सब जगत् की पालना करता, वैसे धार्मिक प्रजा और राजपुरुष अपने राज्य की रक्षा किया करें ॥३॥
Subject
फिर राजप्रजा विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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