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Rigveda Mandal 2 / Sukta 28 / Mantra 3

43 Sukta
11 Mantra
2/28/3
Devata- वरुणः Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तव॑ स्याम पुरु॒वीर॑स्य॒ शर्म॑न्नुरु॒शंस॑स्य वरुण प्रणेतः। यू॒यं नः॑ पुत्रा अदितेरदब्धा अ॒भि क्ष॑मध्वं॒ युज्या॑य देवाः॥

अव॑ । स्या॒म॒ । पु॒रु॒ऽवीर॑स्य । शर्म॑न् । उ॒रु॒ऽशंस॑स्य । व॒रु॒ण॒ । प्र॒ने॒त॒रिति॑ प्रऽनेतः । यू॒यम् । नः॒ । पु॒त्राः॒ । अ॒दि॒तेः॒ । अ॒द॒ब्धाः॒ । अ॒भि । क्ष॒म॒ध्व॒म् । युज्या॑य । दे॒वाः॒ ॥

Mantra without Swara
तव स्याम पुरुवीरस्य शर्मन्नुरुशंसस्य वरुण प्रणेतः। यूयं नः पुत्रा अदितेरदब्धा अभि क्षमध्वं युज्याय देवाः॥

अव। स्याम। पुरुऽवीरस्य। शर्मन्। उरुऽशंसस्य। वरुण। प्रनेतरिति प्रऽनेतः। यूयम्। नः। पुत्राः। अदितेः। अदब्धाः। अभि। क्षमध्वम्। युज्याय। देवाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 3

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Meaning
हे (वरुण) श्रेष्ठ (प्रणेतः) सबके नायक सज्जन विद्वान् जैसे मैं (पुरुवीरस्य) बहुत प्रवीण शूर (उरुशंसस्य) बहुतों से प्रशंसा किये हुए (तव) आपके (शर्मन्) घर में हम लोग सुखी हों, हे (अदब्धाः) अहिंसनीय (नः) हमारे (पुत्राः) पुत्रो! (यूयम्) तुमलोग (युज्याय) युक्त करने योग्य व्यवहार के लिये (देवाः) विद्वान् होकर (अभि,क्षमध्वम्) सब ओर से क्षमा करनेवाले होओ ॥३॥
Essence
हे पुत्रो! जैसे हम लोग उत्तम विद्वान् के सम्बन्ध से नीति विद्या को प्राप्त होके आनन्दित हों, वैसे तुम लोग भी क्षमाशील होके अध्यापकों के अनुकूल आचरण से सुशिक्षित विद्वान् होओ ॥३॥
Subject
फिर पुत्र लोग कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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