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Rigveda Mandal 2 / Sukta 21 / Mantra 1

43 Sukta
6 Mantra
2/21/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒श्व॒जिते॑ धन॒जिते॑ स्व॒र्जिते॑ सत्रा॒जिते॑ नृ॒जित॑ उर्वरा॒जिते॑। अ॒श्व॒जिते॑ गो॒जिते॑ अ॒ब्जिते॑ भ॒रेन्द्रा॑य॒ सोमं॑ यज॒ताय॑ हर्य॒तम्॥

वि॒श्व॒ऽजिते॑ । ध॒न॒ऽजिते॑ । स्वः॒ऽजिते॑ । स॒त्रा॒ऽजिते॑ । नृ॒ऽजिते॑ । उ॒र्व॒रा॒ऽजिते॑ । अ॒श्व॒ऽजिते॑ । गो॒ऽजिते॑ । अ॒प्ऽजिते॑ । भ॒र॒ । इन्द्रा॑य । सोम॑म् । य॒ज॒ताय॑ । ह॒र्य॒तम् ॥

Mantra without Swara
विश्वजिते धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते नृजित उर्वराजिते। अश्वजिते गोजिते अब्जिते भरेन्द्राय सोमं यजताय हर्यतम्॥

विश्वऽजिते। धनऽजिते। स्वःऽजिते। सत्राऽजिते। नृऽजिते। उर्वराऽजिते। अश्वऽजिते। गोऽजिते। अप्ऽजिते। भर। इन्द्राय। सोमम्। यजताय। हर्यतम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 27 Mantra » 1

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Meaning
हे प्रजाजन आप (विश्वजिते) जो विश्व को जीतता वा (सत्राजिते) जो सत्य से उत्कर्षता को प्राप्त होता वा (स्वर्जिते) जो सुख से जीतता वा (नृजिते) जो मनुष्यों से जीतता वा (अश्वजिते) जो घोड़ों से जीतता वा (गोजिते) जो गौओं को जीतता वा (उर्वराजिते) जो सर्व फल पुष्प शस्यादि पदार्थों की प्राप्ति करानेवाली को जीतता वा (धनजिते) जो धन से जीतता (अप्सुजिते) वा जलों में जीतता उसके लिये वा (यजताय) सत्संग करनेवाले (इन्द्राय) सभा और सेनापति के लिये (हर्यतम्) मनोहर (सोमम्) ऐश्वर्य को (भर) धारण करो ॥१॥
Essence
राजा प्रजाजनों को यह अच्छे प्रकार उचित है कि जो सर्वदा विजयशील ऐश्वर्य की उन्नति करनेवाले जन न्याय से प्रजा में वर्त्तें, उनका सत्कार सर्वदा सब करें ॥१॥
Subject
अब छः चावाले इक्कीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के गुणों को कहते हैं।

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