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Rigveda Mandal 2 / Sukta 20 / Mantra 5

43 Sukta
9 Mantra
2/20/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सो अङ्गि॑रसामु॒चथा॑ जुजु॒ष्वान्ब्रह्मा॑ तूतो॒दिन्द्रो॑ गा॒तुमि॒ष्णन्। मु॒ष्णन्नु॒षसः॒ सूर्ये॑ण स्त॒वानश्न॑स्य चिच्छिश्नथत्पू॒र्व्याणि॑॥

सः । अङ्गि॑रसाम् । उ॒चथा॑ । जु॒जु॒ष्वान् । ब्रह्मा॑ । तू॒तो॒त् । इन्द्रः॑ । गा॒तुम् । इ॒ष्णन् । मु॒ष्णन् । उ॒षसः॑ । सूर्ये॑ण । स्त॒वान् । अश्न॑स्य । चि॒त् । शि॒श्न॒थ॒त् । पू॒र्व्याणि॑ ॥

Mantra without Swara
सो अङ्गिरसामुचथा जुजुष्वान्ब्रह्मा तूतोदिन्द्रो गातुमिष्णन्। मुष्णन्नुषसः सूर्येण स्तवानश्नस्य चिच्छिश्नथत्पूर्व्याणि॥

सः। अङ्गिरसाम्। उचथा। जुजुष्वान्। ब्रह्मा। तूतोत्। इन्द्रः। गातुम्। इष्णन्। मुष्णन्। उषसः। सूर्येण। स्तवान्। अश्नस्य। चित्। शिश्नथत्। पूर्व्याणि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 25 Mantra » 5

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Meaning
जो (अङ्गिरसाम्) प्राणियों के (उचथा) कहने योग्य (ब्रह्मा) धनों को (जुजुष्वान्) सेवन किये हुए (गातुम्) पृथिवी को (इष्णन्) सब ओर से देखता हुआ (सूर्य्येण) सूर्य्य के साथ (उषसः) प्रभात समयों को (अश्नस्य) मेघ की (स्तवान्) स्तुतियों को (शिश्नथत्) नष्ट करता है (चित्) उसके समान (पूर्व्याणि) पूर्व्याचार्य्यों ने की हुई (तूतोत्) स्तुतियों को बढ़ावे (सः) वह (इन्द्रः) पुरुषार्थी जन हमारा रक्षक हो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान बढ़ाने और छिन्न-भिन्न करनेवाले होकर राज्य को बढाते हैं, वे उचित और अगले सज्जनों की सेवन की हुई लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं ॥५॥
Subject
अब सभेश के गुणों को अगले मन्त्र में कहा है।

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