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Rigveda Mandal 2 / Sukta 13 / Mantra 10

43 Sukta
13 Mantra
2/13/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वेदनु॑ रोध॒ना अ॑स्य॒ पौंस्यं॑ द॒दुर॑स्मै दधि॒रे कृ॒त्नवे॒ धन॑म्। षळ॑स्तभ्ना वि॒ष्टिरः॒ पञ्च॑ सं॒दृशः॒ परि॑ प॒रो अ॑भवः॒ सास्यु॒क्थ्यः॑॥

विश्वा॑ । इत् । अनु॑ । रो॒ध॒नाः । अ॒स्य॒ । पौंस्य॑म् । द॒दुः । अ॒स्मै॒ । द॒धि॒रे । कृ॒त्नवे॑ । धन॑म् । षट् । अ॒स्त॒भ्नाः॒ । वि॒ऽस्तिरः॑ । पञ्च॑ । स॒म्ऽदृशः॑ । परि॑ । प॒रः । अ॒भ॒वः॒ । सः । अ॒सि॒ । उ॒क्थ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
विश्वेदनु रोधना अस्य पौंस्यं ददुरस्मै दधिरे कृत्नवे धनम्। षळस्तभ्ना विष्टिरः पञ्च संदृशः परि परो अभवः सास्युक्थ्यः॥

विश्वा। इत्। अनु। रोधनाः। अस्य। पौंस्यम्। ददुः। अस्मै। दधिरे। कृत्नवे। धनम्। षट्। अस्तभ्नाः। विऽस्तिरः। पञ्च। सम्ऽदृशः। परि। परः। अभवः। सः। असि। उक्थ्यः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 11 Mantra » 5

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Meaning
मनुष्य (अस्मै) इस (कृत्नवे) कर्म करनेवाले मनुष्य के लिये (षट्,विष्टिरः) छः जो विशेषता से अपने-अपने समय को पार होती हैं वे तुयें (पञ्च) और पाँच (संदृशः) अपने-अपने विषय को देखनेवाले पृथिवी, अप्, तेज, वायु, आकाश ये भूत वा पाँच कर्मेन्द्रियाँ (विश्वा) सब (रोधना) रुकावटों को (अनुददुः) अनुकूलता से देते हैं और (धनम्) धन को (इत्) ही (परि, दधिरे) सब ओर से धारण करते हैं (अस्य) इसके (पौंस्यम्) पुरुषार्थ को अनुकूलता से धारण करते अर्थात् जानते हैं वह (परः) उत्कृष्ट धन को (अस्तभ्नाः) रोकता है और (अभवः) प्रसिद्ध होता है (सः) वह (उक्थ्यः) अनेक में प्रशंसनीय (असि) है ॥१०॥
Essence
जो मनुष्य युक्त आहार-विहार करनेवाले जितेन्द्रिय होते हैं, वे सब तुओं में पाँचों इन्द्रियों से सुखों को प्राप्त होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर प्रकारान्तर से विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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