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Rigveda Mandal 2 / Sukta 11 / Mantra 8

43 Sukta
21 Mantra
2/11/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नि पर्व॑तः सा॒द्यप्र॑युच्छ॒न्त्सं मा॒तृभि॑र्वावशा॒नो अ॑क्रान्। दू॒रे पा॒रे वाणीं॑ व॒र्धय॑न्त॒ इन्द्रे॑षितां ध॒मनिं॑ पप्रथ॒न्नि॥

नि । पर्व॑तः । सा॒दि॒ । अप्र॑ऽयुच्छन् । सम् । मा॒तृऽभिः॑ । वा॒व॒शा॒नः । अ॒क्रा॒न् । दू॒रे । पा॒रे । वाणी॑म् । व॒र्धय॑न्तः । इन्द्र॑ऽइषिताम् । ध॒मनि॑म् । प॒प्र॒थ॒न् । नि ॥

Mantra without Swara
नि पर्वतः साद्यप्रयुच्छन्त्सं मातृभिर्वावशानो अक्रान्। दूरे पारे वाणीं वर्धयन्त इन्द्रेषितां धमनिं पप्रथन्नि॥

नि। पर्वतः। सादि। अप्रऽयुच्छन्। सम्। मातृऽभिः। वावशानः। अक्रान्। दूरे। पारे। वाणीम्। वर्धयन्तः। इन्द्रऽइषिताम्। धमनिम्। पप्रथन्। नि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 3

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Meaning
जो (मातृभिः) मान करनेवाली माता आदि से (वावशानः) कामना किया जाता और (अप्रयुच्छन्) प्रमाद न करता हुआ (पर्वतः) मेघ के समान विद्वानों ने (सम्,सादि) अच्छे प्रकार सिद्ध किया उसके साथ जो दोषों को (दूरे) दूर करते हुए (वाणीम्) सुन्दर शिक्षायुक्त वाणी को (पारे) समुद्र की भूमियों के परभाग में (वर्द्धयन्तः) बढ़ाते हुए औरों को विद्वान् (अक्रान्) करते हैं वे (इन्द्रेषिताम्) परमेश्वर की भेजी हुई वेदवाणी का (नि,पप्रथन्) निरन्तर विस्तार करें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिन सन्तानों को माता उत्तम शिक्षा और विद्या से प्रमादरहित कर बढ़ाती हैं, वे सुखों को प्राप्त होकर सब ओर से बढ़ते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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