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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 7

43 Sukta
16 Mantra
2/1/7
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने द्रविणो॒दा अ॑रं॒कृते॒ त्वं दे॒वः स॑वि॒ता र॑त्न॒धा अ॑सि। त्वं भगो॑ नृपते॒ वस्व॑ ईशिषे॒ त्वं पा॒युर्दमे॒ यस्तेऽवि॑धत्॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । द्र॒वि॒णः॒ऽदाः । अ॒र॒म्ऽकृते॑ । त्वम् । दे॒वः । स॒वि॒ता । र॒त्न॒ऽधाः । अ॒सि॒ । त्वम् । भगः॑ । नृ॒ऽप॒ते॒ । वस्वः॑ । ई॒शि॒षे॒ । त्वम् । पा॒युः । दमे॑ । यः । ते॒ । अवि॑धत् ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने द्रविणोदा अरंकृते त्वं देवः सविता रत्नधा असि। त्वं भगो नृपते वस्व ईशिषे त्वं पायुर्दमे यस्तेऽविधत्॥

त्वम्। अग्ने। द्रविणःऽदाः। अरम्ऽकृते। त्वम्। देवः। सविता। रत्नऽधाः। असि। त्वम्। भगः। नृऽपते। वस्वः। ईशिषे। त्वम्। पायुः। दमे। यः। ते। अविधत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे (अग्ने) सूर्य के समान सुख देनेवाले ! (त्वम्) आप (अरङ्कृते) पूरे पुरुषार्थ करनेवाले के लिये (द्रविणोदाः) धन देनेवाले (त्वम्) आप (रत्नधाः) रत्नों को धारण और (सविता) ऐश्वर्य के प्रति प्रेरणा करनेवाले (देवः) मनोहर (असि) हैं। हे (नृपते) मनुष्यों की पालना करनेवाले और (भगः) ऐश्वर्यवान् (त्वम्) आप (वस्वः) धनों की (इशिषे) ईश्वरता रखते हैं। (यः) जो (ते) आपके (दमे) निज घर में (अविधत्) विधान करता है। उसके (त्वम्) आप (पायुः) पालनेवाले हैं ॥७॥
Essence
जो पुरुषार्थी मनुष्यों का सत्कार तथा आलस्य करनेवालों का तिरस्कार करनेवाले और सेवकों के लिये सुख देनेवाले ऐश्वर्यवान् हों, वे इस संसार में सबके राजा होने को योग्य होवें ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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