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Rigveda Mandal 1 / Sukta 96 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/96/3
Devata- द्रविणोदा अग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमी॑ळत प्रथ॒मं य॑ज्ञ॒साधं॒ विश॒ आरी॒राहु॑तमृञ्जसा॒नम्। ऊ॒र्जः पु॒त्रं भ॑र॒तं सृ॒प्रदा॑नुं दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम् ॥

तम् । इ॒ळ॒त॒ । प्र॒थ॒मम् । य॒ज्ञ॒ऽसाध॑म् । विशः॑ । आरीः॑ । आऽहु॑तम् । ऋ॒ञ्ज॒सा॒नम् । ऊ॒र्जः । पु॒त्रम् । भ॒र॒तम् । सृ॒प्रऽदा॑नुम् । दे॒वाः । अ॒ग्निम् । धा॒र॒य॒न् । द्र॒वि॒णः॒ऽदाम् ॥

Mantra without Swara
तमीळत प्रथमं यज्ञसाधं विश आरीराहुतमृञ्जसानम्। ऊर्जः पुत्रं भरतं सृप्रदानुं देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम् ॥

तम्। इळत। प्रथमम्। यज्ञऽसाधम्। विशः। आरीः। आऽहुतम्। ऋञ्जसानम्। ऊर्जः। पुत्रम्। भरतम्। सृप्रऽदानुम्। देवाः। अग्निम्। धारयन्। द्रविणःऽदाम् ॥ १.९६.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (प्रथमम्) समस्त उत्पन्न जगत् के पहिले वर्त्तमान (यज्ञसाधम्) विज्ञान योगाभ्यासादि यज्ञों से जाना जाता (ऋञ्जसानम्) विवेक आदि साधनों से अच्छे प्रकार सिद्ध किया जाता (आहुतम्) विद्वानों से सत्कार को प्राप्त (आरीः) प्राप्त होने योग्य (विशः) प्रजाजनों और (भरतम्) धारणा वा पुष्टि करनेवाला (सृप्रदानुम्) जिससे कि ज्ञान देना बनता है उस (ऊर्जः) कारणरूप पवन से (पुत्रम्) प्रसिद्ध हुए प्राण को उत्पन्न करने और (द्रविणोदाम्) धन आदि पदार्थों के देनेवाले (अग्निम्) जगदीश्वर को (देवाः) विद्वान् जन (धारयन्) धारण करते वा कराते हैं (तम्) उस परमेश्वर की तुम नित्य (ईडत) स्तुति करो ॥ ३ ॥
Essence
हे जिज्ञासु अर्थात् परमेश्वर का विज्ञान चाहनेवाले मनुष्यो ! तुम जिस ईश्वर ने सब जीवों के लिये सब सृष्टियों को उत्पन्न करके प्राप्त कराई हैं वा जिसने सृष्टि धारण करनेहारा पवन और सूर्य रचा है, उसको छोड़ के अन्य किसी की कभी ईश्वरभाव से उपासना मत करो ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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