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Rigveda Mandal 1 / Sukta 89 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/89/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श॒तमिन्नु श॒रदो॒ अन्ति॑ देवा॒ यत्रा॑ नश्च॒क्रा ज॒रसं॑ त॒नूना॑म्। पु॒त्रासो॒ यत्र॑ पि॒तरो॒ भव॑न्ति॒ मा नो॑ म॒ध्या री॑रिष॒तायु॒र्गन्तोः॑ ॥

श॒तम् । इत् । नु । श॒रदः॑ । अन्ति॑ । दे॒वाः॒ । यत्र॑ । नः॒ । च॒क्र । ज॒रस॑म् । त॒नूना॑म् । पु॒त्रासः॑ । यत्र॑ । पि॒तरः॑ । भव॑न्ति । मा । नः॒ । म॒ध्या । रि॒रि॒ष॒त॒ । आयुः॑ । गन्तोः॑ ॥

Mantra without Swara
शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्। पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥

शतम्। इत्। नु। शरदः। अन्ति। देवाः। यत्र। नः। चक्र। जरसम्। तनूनाम्। पुत्रासः। यत्र। पितरः। भवन्ति। मा। नः। मध्या। रिरिषत। आयुः। गन्तोः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 4

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Meaning
हे (अन्ति) विद्या आदि सुख साधनों से जीनेवाले (देवाः) विद्वानो ! तुम (यत्र) जिस सत्य व्यवहार में (तनूनाम्) अपने शरीरों के (शतम्) सौ (शरदः) वर्ष (जरसम्) वृद्धपन का (चक्र) व्यतीत कर सको (यत्र) जहाँ (नः) हमारे (मध्या) मध्य में (पुत्रासः) पुत्र लोग (इत्) ही (पितरः) अवस्था और विद्या से युक्त वृद्ध (नु) शीघ्र (भवन्ति) होते हैं, उस (आयुः) जीवन को (गन्तोः) प्राप्त होने को प्रवृत्त हुए (नः) हम लोगों को शीघ्र (मा रीरिषत) नष्ट मत कीजिये ॥ ९ ॥
Essence
जिस विद्या में बालक भी वृद्ध होते वा जिस शुभ आचरण में वृद्धावस्था होती है, वह सब व्यवहार विद्वानों के संग ही से हो सकता है और विद्वानों को चाहिये कि यह उक्त व्यवहार सबको प्राप्त करावें ॥ ९ ॥
Subject
फिर विद्वान् लोग विद्यार्थियों के साथ कैसे वर्त्तें, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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