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Rigveda Mandal 1 / Sukta 80 / Mantra 8

191 Sukta
16 Mantra
1/80/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
वि ते॒ वज्रा॑सो अस्थिरन्नव॒तिं ना॒व्या॒३॒॑अनु॑। म॒हत्त॑ इन्द्र वी॒र्यं॑ बा॒ह्वोस्ते॒ बलं॑ हि॒तमर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

वि । ते॒ । वज्रा॑सः । अ॒स्थि॒र॒न् । न॒व॒तिम् । ना॒व्याः॑ । अनु॑ । म॒हत् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वी॒र्य॑म् । बा॒ह्वोः । ते॒ । बल॑म् । हि॒तम् । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

Mantra without Swara
वि ते वज्रासो अस्थिरन्नवतिं नाव्या३अनु। महत्त इन्द्र वीर्यं बाह्वोस्ते बलं हितमर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

वि। ते। वज्रासः। अस्थिरन्। नवतिम्। नाव्याः। अनु। महत्। ते। इन्द्र। वीर्यम्। बाह्वोः। ते। बलम्। हितम्। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 30 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) ! जो (ते) तेरी (वज्रासः) शस्त्रास्त्रयुक्त दृढ़तर सेना (नवतिम्) नब्बे (नाव्याः) तारनेवाली नौकाओं को (अनुव्यस्थिरन्) अनुकूलता से व्यवस्थित करती है और जो (ते) तेरी (बाह्वोः) भुजाओं में (महत्) बड़ा (वीर्यम्) पराक्रम और (ते) तेरी भुजाओं में (बलम्) बस (हितम्) स्थित है, उससे (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) यथावत् सत्कार करता हुआ राज्यलक्ष्मी को तू प्राप्त हो ॥ ८ ॥
Essence
जो विद्वान् राज्य के बढ़ाने की इच्छा करें, वे बड़ी अग्नियन्त्र से चलाने योग्य नौकाओं को बनाकर द्वीप-द्वीपान्तरों में जा-आ के व्यवहार से धन आदि के लाभों को बढ़ा के अपने राज्य को धन-धान्य से सुभूषित करें ॥ ८ ॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में पूर्वोक्त सभाध्यक्ष और सूर्य के गुणों का वर्णन किया है ॥

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