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Rigveda Mandal 1 / Sukta 77 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/77/3
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स हि क्रतुः॒ स मर्यः॒ स सा॒धुर्मि॒त्रो न भू॒दद्भु॑तस्य र॒थीः। तं मेधे॑षु प्रथ॒मं दे॑व॒यन्ती॒र्विश॒ उप॑ ब्रुवते द॒स्ममारीः॑ ॥

सः । हि । क्रतुः॑ । सः । मर्यः॑ । सः । सा॒धुः । मि॒त्रः । न । भू॒त् । अद्भु॑तस्य । र॒थीः । तम् । मेधे॑षु । प्र॒थ॒मम् । दे॒व॒ऽयन्तीः । विशः॑ । उप॑ । ब्रु॒व॒ते॒ । द॒स्मम् । आरीः॑ ॥

Mantra without Swara
स हि क्रतुः स मर्यः स साधुर्मित्रो न भूदद्भुतस्य रथीः। तं मेधेषु प्रथमं देवयन्तीर्विश उप ब्रुवते दस्ममारीः ॥

सः। हि। क्रतुः। सः। मर्यः। सः। साधुः। मित्रः। न। भूत्। अद्भुतस्य। रथीः। तम्। मेधेषु। प्रथमम्। देवऽयन्तीः। विशः। उप। ब्रुवते। दस्मम्। आरीः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 3

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Meaning
(देवयन्तीः) कामनायुक्त (आरीः) ज्ञानवाली (विशः) प्रजा (मेधेषु) पढ़ने-पढ़ाने और संग्राम आदि यज्ञों में (तम्) उस (दस्मम्) दुःखनाश करनेवाले को सभाध्यक्ष मान कर (प्रथमम्) सबसे उत्तम (उपब्रुवते) कहती है कि जो (मित्रः) सबका मित्र (न) जैसा (भूत्) हो (स हि) वही सब प्रकार (क्रतुः) बुद्धि और सुकर्म से युक्त (सः) वही (मर्य्यः) मनुष्यपन का रखनेवाला और (सः) वही (साधुः) सबका उपकार करने तथा श्रेष्ठ मार्ग में चलनेवाला विद्वान् (अद्भुतस्य) आश्चर्यकर्मों से युक्त सेना का (रथीः) उत्तम रथवाला रथी होवे ॥ ३ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जो सबसे अधिक गुण, कर्म और स्वभाव तथा सबका उपकार करनेवाला सज्जन मनुष्य है, उसीको सभाध्यक्ष का अधिकार देके राजा माने अर्थात् किसी एक मनुष्य को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देवें, किन्तु शिष्ट पुरुषों की जो सभा है, उसके आधीन राज्य के सब काम रक्खें ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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