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Rigveda Mandal 1 / Sukta 68 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/68/7
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
होता॒ निष॑त्तो॒ मनो॒रप॑त्ये॒ स चि॒न्न्वा॑सां॒ पती॑ रयी॒णाम् ॥

होता॑ । निऽस॑त्तः । मनोः॑ । अप॑त्ये । सः । चि॒त् । नु । आ॒सा॒म् । पतिः॑ । र॒यी॒णाम् ॥

Mantra without Swara
होता निषत्तो मनोरपत्ये स चिन्न्वासां पती रयीणाम् ॥

होता। निऽसत्तः। मनोः। अपत्ये। सः। चित्। नु। आसाम्। पतिः। रयीणाम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 7

Bhashya

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Meaning
जो (निषत्तः) सर्वत्र स्थित (मनोः) मनुष्य के (अपत्ये) सन्तान में (रयीणाम्) राज्यश्री आदि धनों का (होता) देनेवाला है (सः) वह ईश्वर विद्युत् अग्नि (आसाम्) इन प्रजाओं का (पतिः) पालन करनेवाला है। हे (अमूराः) मूढ़पन आदि गुणों से रहित ज्ञानवाले ! (स्वैः) अपने (दक्षैः) शिक्षा सहित चतुराई आदि गुणों के साथ (तनूषु) शरीरों में वर्त्तमान होते हुए (मिथः) परस्पर (रेतः) विद्या शिक्षारूपी वीर्य का विस्तार करते हुए तुम लोग इस की (समिच्छन्त) अच्छे प्रकार शिक्षा करो (चित्) और तुम सब विद्याओं को (नु) शीघ्र (जानत) अच्छे प्रकार जानो ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि परस्पर मित्र हो और समग्र विद्याओं को शीघ्र जानकर निरन्तर आनन्द भोगें ॥ ४ ॥
Subject
फिर अध्यापक और शिष्य कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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