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Rigveda Mandal 1 / Sukta 66 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/66/5
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दु॒रोक॑शोचिः॒ क्रतु॒र्न नित्यो॑ जा॒येव॒ योना॒वरं॒ विश्व॑स्मै ॥

दु॒रोक॑ऽशोचिः॑ । क्रतुः॑ । न । नित्यः॑ । जा॒याऽइ॑व । योनौ॑ । अर॑म् । विश्व॑स्मै ॥

Mantra without Swara
दुरोकशोचिः क्रतुर्न नित्यो जायेव योनावरं विश्वस्मै ॥

दुरोकऽशोचिः। क्रतुः। न। नित्यः। जायाऽइव। योनौ। अरम्। विश्वस्मै ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
(यत्) जो मनुष्य (क्रतुः) बुद्धि वा कर्म के (न) समान (नित्यः) अविनाशिस्वभाव (जायेव) भार्या के समान (योनौ) कारणरूप में (अरम्) अलंकर्त्ता (श्वेतः) शुद्ध शुक्लवर्ण के (न) समान (विक्षु) प्रजाओं में शुद्ध करने (रथः) सुवर्णादि से निर्मित विमानादि यान के (न) समान (रुक्मी) रुचि करनेवाले कर्म वा गुणयुक्त (दुरोकशोचिः) दूरस्थानों में दीप्तियुक्त (विश्वस्मै) सब जगत् के लिये सुख करने (समत्सु) संग्रामों में (चित्रः) अद्भुत स्वभावयुक्त (अभ्राट्) आप ही प्रकाशमान होने से शुद्ध (त्वेषः) प्रदीप्त स्वभाववाला है, वही चक्रवर्त्ति राजा होने के योग्य होता है ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो ज्ञान और कर्मकाण्ड के समान सदा वर्त्तमान, अनुकूल स्त्री के समान सुखों का निमित्त, सूर्य के समान शुभगुणों को प्रकाश करने, आश्चर्य गुणवाले रथ के समान मोक्ष में प्राप्त करने, वीर के समान युद्धों में विजय करनेवाला हो, वह राज्यलक्ष्मी को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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