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Rigveda Mandal 1 / Sukta 48 / Mantra 4

191 Sukta
16 Mantra
1/48/4
Devata- उषाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराट्सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उषो॒ ये ते॒ प्र यामे॑षु यु॒ञ्जते॒ मनो॑ दा॒नाय॑ सू॒रयः॑ । अत्राह॒ तत्कण्व॑ एषां॒ कण्व॑तमो॒ नाम॑ गृणाति नृ॒णाम् ॥

उषः॑ । ये । ते॒ । प्र । यामे॑षु । यु॒ञ्जते॑ । मनः॑ । दा॒नाय॑ । सू॒रयः॑ । अत्र॑ । अह॑ । तत् । कण्वः॑ । ए॒षा॒म् । कण्व॑ऽतमः । नाम॑ । गृ॒णा॒ति॒ । नृ॒णाम् ॥

Mantra without Swara
उषो ये ते प्र यामेषु युञ्जते मनो दानाय सूरयः । अत्राह तत्कण्व एषां कण्वतमो नाम गृणाति नृणाम् ॥

उषः । ये । ते । प्र । यामेषु । युञ्जते । मनः । दानाय । सूरयः । अत्र । अह । तत् । कण्वः । एषाम् । कण्वतमः । नाम । गृणाति । नृणाम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वन् जो (सूरयः) स्तुति करनेवाले विद्वान् लोग ! (ते) आपसे उपदेश पाके (अत्र) इस (उषः) प्रभात के (यामेषु) प्रहरों में (दानाय) विद्यादि दान के लिये (मनः) विज्ञान युक्त चित्त को (प्रयुंजते) प्रयुक्त करते हैं वे जीवन्मुक्त होते हैं और जो (कण्वः) मेधावी (एषाम्) इन (नृणाम्) प्रधान विद्वानों के (नाम) नामों को (गृणाति) प्रशंसित करता है वह (कण्वतमः) अतिशय मेधावी होता है ॥४॥
Essence
जो मनुष्य एकान्त पवित्र निरुपद्रव देश में स्थिर होकर यमादि संयमान्त उपासना के नव अंगों का अभ्यास करते हैं वे निर्मल आत्मा होकर ज्ञानी श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं और जो इनका संग और सेवा करते हैं वे भी शुद्ध अन्तःकरण होके आत्मयोग के जानने के अधिकारी होते हैं ॥४॥
Subject
जो प्रभात समय में योगाऽभ्यास करते हैं, वे किसको प्राप्त होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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