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Rigveda Mandal 1 / Sukta 37 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/37/8
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
येषा॒मज्मे॑षु पृथि॒वी जु॑जु॒र्वाँइ॑व वि॒श्पतिः॑ । भि॒या यामे॑षु॒ रेज॑ते ॥

येषा॑म् । अज्मे॑षु । पृ॒थि॒वी । जु॒जु॒र्वान्ऽइ॑व । वि॒श्पतिः॑ । भि॒या । यामे॑षु । रेज॑ते ॥

Mantra without Swara
येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वाँइव विश्पतिः । भिया यामेषु रेजते ॥

येषाम् । अज्मेषु । पृथिवी । जुजुर्वान्इव । विश्पतिः । भिया । यामेषु । रेजते॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वान् लोगो ! (येषाम्) जिन पवनों के (अज्मेषु) पहुंचाने फेंकने आदि गुणों में (भिया) भय से (जुजुर्वानिव) जैसे वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ (विश्पतिः) प्रजा की पालना करनेवाला राजा शत्रुओं से कम्पता है वैसे (पृथिवी) पृथिवी आदि लोक (यामेषु) अपने-२ चलने रूप परिधि मार्गों में (रेजते) चलायमान होते हैं ॥८॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई राजा जीर्ण अवस्था को प्राप्त हुआ रोग वा शत्रुओं के भय से कम्पता है वैसे पवनों से सब प्रकार धारण किये हुए पृथिवी आदि लोक घूंमते हैं। और सूत्र के समान बंधे हुए वायु के विना किसी लोक की स्थिति वा भ्रमण का संभव कभी नहीं हो सकता ॥८॥ मोक्षमूलर साहिब का कथन कि जिन पवनों के दौड़नें में पृथिवी निर्बल राजा के समान भय से मार्गों में कम्पित होती है। संस्कृत की रीति से यह बड़ा दोष है कि जो स्त्रीलिङ्ग उपमेय के साथ पुल्लिङ्ग वाची उपमान दिया है। सो यह मौक्षमू० का कथन मिथ्या है क्योंकि वायु के योग ही से पृथिवी के धारण वा भ्रमण का संभव होकर वायु के भीषण ही से पृथिवी आदि लोकों के स्वरूप की स्थिति होती है तथा यह लिङ्ग व्यत्यय से उपमालङ्कार में दोष नहीं हो सकता, जैसे मनुष्य के तुल्य वायु और वायु के समान मन चलता है, श्येनपक्षी के समान मेना, स्त्री के समान पुरुष वा पुरुष के समान स्त्री, हाथी के समान भैंसी वा हथिनी के समान, चंद्रमा के समान मुख, सूर्य प्रकाश के समान राजनीति, इस प्रकार उपमालङ्कार में लिङ्ग भेद से कोई भी दोष नहीं आ-सकता ॥८॥
Subject
फिर उन पवनों के योग से क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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