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Rigveda Mandal 1 / Sukta 181 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/181/2
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वा॒मश्वा॑स॒: शुच॑यः पय॒स्पा वात॑रंहसो दि॒व्यासो॒ अत्या॑:। म॒नो॒जुवो॒ वृष॑णो वी॒तपृ॑ष्ठा॒ एह स्व॒राजो॑ अ॒श्विना॑ वहन्तु ॥

आ । वा॒म् । अश्वा॑सः । शुच॑यः । प॒यः॒ऽपाः । वात॑ऽरंहसः । दि॒व्यासः॑ । अत्याः॑ । म॒नः॒ऽजुवः॑ । वृष॑णः । वी॒तऽपृ॑ष्ठाः । आ । इ॒ह । स्व॒ऽराजः॑ । अ॒श्विना॑ । व॒ह॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
आ वामश्वास: शुचयः पयस्पा वातरंहसो दिव्यासो अत्या:। मनोजुवो वृषणो वीतपृष्ठा एह स्वराजो अश्विना वहन्तु ॥

आ। वाम्। अश्वासः। शुचयः। पयःऽपाः। वातऽरंहसः। दिव्यासः। अत्याः। मनःऽजुवः। वृषणः। वीतऽपृष्ठाः। आ। इह। स्वऽराजः। अश्विना। वहन्तु ॥ १.१८१.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 25 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वानो ! जो (अश्वासः) शीघ्रगामी घोड़े (शुचयः) पवित्र (पयस्पाः) जल के पीनेवाले (दिव्यासः) दिव्य (वातरंहसः) पवन के समान वेग वा (मनोजुवः) मनोवद्वेगवाले (वृषणः) परशक्ति बन्धक (वीतपृष्ठाः) जिन्हों से पृथिवी तल व्याप्त (स्वराजः) जो आप प्रकाशमान (अत्याः) निरन्तर जानेवाले (आ) अच्छे प्रकार हैं वे (इह) इस स्थान में (वाम्) तुम (अश्विना) अध्यापक और उपदेशकों को (आ, वहन्तु) पहुँचावें ॥ २ ॥
Essence
विद्वान् जन जिन बिजुली आदि पदार्थों को गुण, कर्म, स्वभाव से जानें उनका औरों के लिये भी उपदेश देवें। जबतक मनुष्य सृष्टि की पदार्थविद्या को नहीं जानते, तबतक संपूर्ण सुख को नहीं प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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