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Rigveda Mandal 1 / Sukta 177 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/177/4
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं य॒ज्ञो दे॑व॒या अ॒यं मि॒येध॑ इ॒मा ब्रह्मा॑ण्य॒यमि॑न्द्र॒ सोम॑:। स्ती॒र्णं ब॒र्हिरा तु श॑क्र॒ प्र या॑हि॒ पिबा॑ नि॒षद्य॒ वि मु॑चा॒ हरी॑ इ॒ह ॥

अ॒यम् । य॒ज्ञः । दे॒व॒ऽयाः । अ॒यम् । मि॒येधः॑ । इ॒मा । ब्रह्मा॑णि । अ॒यम् । इ॒न्द्र॒ । सोमः॑ । स्ती॒र्णम् । ब॒र्हिः । आ । तु । श॒क्र॒ । प्र । या॒हि॒ । पिब॑ । नि॒ऽसद्य॑ । वि । मु॒च॒ । हरी॒ इति॑ । इ॒ह ॥

Mantra without Swara
अयं यज्ञो देवया अयं मियेध इमा ब्रह्माण्ययमिन्द्र सोम:। स्तीर्णं बर्हिरा तु शक्र प्र याहि पिबा निषद्य वि मुचा हरी इह ॥

अयम्। यज्ञः। देवऽयाः। अयम्। मियेधः। इमा। ब्रह्माणि। अयम्। इन्द्र। सोमः। स्तीर्णम्। बर्हिः। आ। तु। शक्र। प्र। याहि। पिब। निऽसद्य। वि। मुच। हरी इति। इह ॥ १.१७७.४

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 4

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Meaning
हे (शक्र) शक्तिमान् (इन्द्र) सभापति ! (अयम्) यह (देवयाः) जिससे दिव्य गुण वा उत्तम विद्वानों को प्राप्त होना होता वह (यज्ञः) राजधर्म और शिल्प की सङ्गति से उन्नति को प्राप्त हुआ यज्ञ वा (अयम्) यह (मियेधः) जिसकी पदार्थों के डारने से वृद्धि होती वह (अयम्) यह (सोमः) बड़ी बड़ी ओषधियों का रस वा ऐश्वर्य (तु) और यह (स्तीर्णम्) ढंपा हुआ (बर्हिः) उत्तम आसन है (निसद्य) इस आसन पर बैठ (इमा) इन (ब्रह्माणि) धनों को (प्रायाहि) उत्तमता से प्राप्त होओ। इस उक्त ओषधि को (पिब) पी, (इह) यहाँ (हरी) बिजुली के धारण और आकर्षणरूपी घोड़ों को स्वीकार कर और दुःख को (विमुच) छोड़ ॥ ४ ॥
Essence
सब मनुष्यों को व्यवहार में अच्छा यत्न कर जब राजा, ब्रह्मचारी तथा विद्या और अवस्था से बढ़ा हुआ सज्जन आवे तब आसन आदि से उसका सत्कार कर पूछना चाहिए। वह उनके प्रति यथोचित धर्म के अनुकूल विद्या की प्राप्ति करनेवाले वचन को कहे जिससे दुःख की हानि सुख की वृद्धि और बिजुली आदि पदार्थों की भी सिद्धि हो ॥ ४ ॥
Subject
अब राजा और विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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