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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 10

191 Sukta
52 Mantra
1/164/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ति॒स्रो मा॒तॄस्त्रीन्पि॒तॄन्बिभ्र॒देक॑ ऊ॒र्ध्वस्त॑स्थौ॒ नेमव॑ ग्लापयन्ति। म॒न्त्रय॑न्ते दि॒वो अ॒मुष्य॑ पृ॒ष्ठे वि॑श्व॒विदं॒ वाच॒मवि॑श्वमिन्वाम् ॥

ति॒स्रः । मा॒तॄः । त्रीन् । पि॒तॄन् । बिभ्र॑त् । एकः॑ । ऊ॒र्ध्वः । त॒स्थौ॒ । न । ई॒म् । अव॑ । ग्ल॒प॒य॒न्ति॒ । म॒न्त्रय॑न्ते । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । पृ॒ष्ठे । वि॒श्व॒ऽविद॑म् । वाच॑म् । अवि॑श्वऽमिन्वाम् ॥

Mantra without Swara
तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति। मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥

तिस्रः। मातॄः। त्रीन्। पितॄन्। बिभ्रत्। एकः। ऊर्ध्वः। तस्थौ। न। ईम्। अव। ग्लापयन्ति। मन्त्रयन्ते। दिवः। अमुष्य। पृष्ठे। विश्वऽविदम्। वाचम्। अविश्वऽमिन्वाम् ॥ १.१६४.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 5

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Meaning
जो (तिस्रः) तीन (मातॄः) उत्तम, मध्यम, अधम, भूमियों तथा (त्रीन्) बिजुली और सूर्यरूप तीन (पितॄन्) पालक अग्नियों को (ईम्) सब ओर से (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (ऊर्ध्वः) ऊपर ऊँचा (एकः) एक सूत्रात्मा वायु (तस्थौ) स्थिर होता है जो विद्वान् जन उसको (अव, ग्लापयन्ति) कहते-सुनते अर्थात् उसके विषय में वार्त्तालाप करते हैं तथा (अविश्वमिन्वाम्) जो सबसे न सेवन की गई (विश्वविदम्) सब लोग उसको प्राप्त होते उस (वाचम्) वाणी को (मन्त्रयन्ते) सब ओर से विचारपूर्वक गुप्त कहते हैं वे (अमुष्य) उस दूरस्थ (दिवः) प्रकाशमान सूर्य के (पृष्ठे) परभाग में विराजमान होते हैं, वे (न) नहीं दुःख को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
Essence
जो सूत्रात्मा वायु, अग्नि, जल और पृथिवी को धारण करता है उसको अभ्यास से जानके सत्य वाणी का औरों के लिये उपदेश करे ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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