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Rigveda Mandal 1 / Sukta 162 / Mantra 7

191 Sukta
22 Mantra
1/162/7
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ताः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उप॒ प्रागा॑त्सु॒मन्मे॑ऽधायि॒ मन्म॑ दे॒वाना॒माशा॒ उप॑ वी॒तपृ॑ष्ठः। अन्वे॑नं॒ विप्रा॒ ऋष॑यो मदन्ति दे॒वानां॑ पु॒ष्टे च॑कृमा सु॒बन्धु॑म् ॥

उप॑ । प्र॑ । अ॒गा॒त् । सु॒ऽमत् । मे॒ । अ॒धा॒यि॒ । मन्म॑ । दे॒वाना॑म् । आशाः॑ । उप॑ । वी॒तऽपृ॑ष्ठः । अनु॑ । ए॒न॒म् । विप्राः॑ । ऋष॑यः । म॒द॒न्ति॒ । दे॒वाना॑म् । पु॒ष्टे । च॒कृ॒म॒ । सु॒ऽबन्धु॑म् ॥

Mantra without Swara
उप प्रागात्सुमन्मेऽधायि मन्म देवानामाशा उप वीतपृष्ठः। अन्वेनं विप्रा ऋषयो मदन्ति देवानां पुष्टे चकृमा सुबन्धुम् ॥

उप। प्र। अगात्। सुऽमत्। मे। अधायि। मन्म। देवानाम्। आशाः। उप। वीतऽपृष्ठः। अनु। एनम्। विप्राः। ऋषयः। मदन्ति। देवानाम्। पुष्टे। चकृम। सुऽबन्धुम् ॥ १.१६२.७

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 2

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Meaning
जिसने (देवानाम्) विद्वानों का और (मे) मेरे (मन्म) विज्ञान और (आशाः) प्राप्ति की इच्छाओं को (उप, अधायि) समीप होकर धारण किया वा जो (सुमत्) सुन्दर मानता (वीतपृष्ठः) सिद्धान्तों में व्याप्त हुआ विद्वान् जन उक्त ज्ञान और उक्त आशाओं को (उप, प्र अगात्) समीप होकर अच्छे प्रकार प्राप्त हो वा जो (ऋषयः) वेदार्थज्ञानवाले (विप्राः) धीरबुद्धि जन (सुबन्धुम्) जिसके सुन्दर भाई हैं उसको (अनु, मदन्ति) अनुमोदित करते हैं, (एनम्) इस सुबन्धु सज्जन को उक्त (देवानाम्) व्यास साक्षात् कृतशास्त्रसिद्धान्त विद्वान् जनों को (पुष्टे) पुष्टियुक्त व्यवहार में हम लोग (चकृम) करें अर्थात् नियत करें ॥ ७ ॥
Essence
जो विद्वानों के सिद्धान्त किये हुए विज्ञान का धारण कर तदनुकूल हो विद्वान् होते हैं, वे शरीर और आत्मा की पुष्टि से युक्त होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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