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Rigveda Mandal 1 / Sukta 156 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/156/2
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यः पू॒र्व्याय॑ वे॒धसे॒ नवी॑यसे सु॒मज्जा॑नये॒ विष्ण॑वे॒ ददा॑शति। यो जा॒तम॑स्य मह॒तो महि॒ ब्रव॒त्सेदु॒ श्रवो॑भि॒र्युज्यं॑ चिद॒भ्य॑सत् ॥

यः । पू॒र्व्याय॑ । वे॒धसे॑ । नवी॑यसे । सु॒मत्ऽजा॑नये । विष्ण॑वे । ददा॑शति । यः । जा॒तम् । अ॒स्य॒ । म॒ह॒तः । महि॑ । ब्रव॑त् । सः । इत् । ऊँ॒ इति॑ । श्रवः॑ऽभिः । युज्य॑म् । चि॒त् । अ॒भि । अ॒स॒त् ॥

Mantra without Swara
यः पूर्व्याय वेधसे नवीयसे सुमज्जानये विष्णवे ददाशति। यो जातमस्य महतो महि ब्रवत्सेदु श्रवोभिर्युज्यं चिदभ्यसत् ॥

यः। पूर्व्याय। वेधसे। नवीयसे। सुमत्ऽजानये। विष्णवे। ददाशति। यः। जातम्। अस्य। महतः। महि। ब्रवत्। सः। इत्। ऊँ इति। श्रवःऽभिः। युज्यम्। चित्। अभि। असत् ॥ १.१५६.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 2

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Meaning
(यः) जो (नवीयसे) अत्यन्त विद्या पढ़ा हुआ नवीन (सुमज्जानये) सुन्दरता से पाई हुई विद्या से प्रसिद्ध (पूर्व्याय) पूर्वज विद्वानों के द्वारा अच्छी सिखावटों से सिखाये हुए (वेधसे) मेधावी अर्थात् धीर (विष्णवे) विद्या में व्याप्त होने का स्वभाव रखनेवाले के लिये विज्ञान (ददाशति) देता है वा (यः) जो (अस्य) इस (महतः) सत्कार करने योग्य जन के (महि) महान् प्रशंसित (जातम्) उत्पन्न हुए विज्ञान को (ब्रवत्) प्रकट कहे (उ) और (श्रवोभिः) श्रवण, मनन और निदिध्यासन अर्थात् अत्यन्त धारण करने-विचारने से अत्यन्त उत्पन्न हुए (युज्यम्) समाधान के योग्य विज्ञान का (अभ्यसत्) अभ्यास करे (सः, चित्) वही विद्वान् हो और (इत्) वही पढ़ाने को योग्य हो ॥ २ ॥
Essence
जो निष्कपटता से बुद्धिमान् विद्यार्थियों को पढ़ाते वा उनको उपदेश देते हैं और जो धर्मयुक्त व्यवहार से पढ़ते और अभ्यास करते हैं, वे सब अतीव विद्वान् और धार्मिक होकर बड़े सुख को प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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