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Rigveda Mandal 1 / Sukta 151 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/151/6
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ वा॑मृ॒ताय॑ के॒शिनी॑रनूषत॒ मित्र॒ यत्र॒ वरु॑ण गा॒तुमर्च॑थः। अव॒ त्मना॑ सृ॒जतं॒ पिन्व॑तं॒ धियो॑ यु॒वं विप्र॑स्य॒ मन्म॑नामिरज्यथः ॥

आ । वा॒म् । ऋ॒ताय॑ । के॒शिनीः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । मित्र॑ । यत्र॑ । वरु॑ण । गा॒तुम् । अर्च॑थः । अव॑ । त्मना॑ । सृ॒जत॑म् । पिन्व॑तम् । धियः॑ । यु॒वम् । विप्र॑स्य । मन्म॑नाम् । इ॒र॒ज्य॒थः॒ ॥

Mantra without Swara
आ वामृताय केशिनीरनूषत मित्र यत्र वरुण गातुमर्चथः। अव त्मना सृजतं पिन्वतं धियो युवं विप्रस्य मन्मनामिरज्यथः ॥

आ। वाम्। ऋताय। केशिनीः। अनूषत। मित्र। यत्र। वरुण। गातुम्। अर्चथः। अव। त्मना। सृजतम्। पिन्वतम्। धियः। युवम्। विप्रस्य। मन्मनाम्। इरज्यथः ॥ १.१५१.६

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 1

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Meaning
हे (मित्र) मित्र और (वरुण) श्रेष्ठ विद्वानो ! (यत्र) जहाँ (ऋताय) सत्याचरण के लिये (केशिनीः) चमक-दमकवाली सुन्दरी स्त्री (वाम्) तुम दोनों की (अनूषत) स्तुति करें वहाँ (युवम्) तुम दोनों (गातुम्) सत्य स्तुति को (आ, अर्चथः) अच्छे प्रकार प्रशंसित करते हो (त्मना) अपने से (विप्रस्य) धीरबुद्धि युक्त सज्जन की (धियः) उत्तम बुद्धियों को (अव, सृजतम्) निरन्तर उत्पन्न करो और (पिन्वतम्) उपदेश द्वारा सींचो (मन्मनाम्) और मान करती हुई को (इरज्यथः) ऐश्वर्ययुक्त करो ॥ ६ ॥
Essence
जो यहाँ प्रशंसायुक्त स्त्रियाँ और जो पुरुष हैं वे अपने समान पुरुष-स्त्रियों के साथ संयोग करें, ब्रह्मचर्य से और विद्या से विशेष ज्ञान की उन्नति कर ऐश्वर्य को बढ़ावें ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

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