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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 8

191 Sukta
13 Mantra
1/142/8
Devata- दैव्यौ होतारौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
म॒न्द्रजि॑ह्वा जुगु॒र्वणी॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मं सि॒ध्रम॒द्य दि॑वि॒स्पृश॑म् ॥

म॒न्द्रऽजि॑ह्वा । जु॒गु॒र्वणी॒ इति॑ । होता॑रा । दैव्या॑ । क॒वी । य॒ज्ञम् । नः॒ । य॒क्ष॒ता॒म् । इ॒मम् । सि॒ध्रम् । अ॒द्य । दि॒वि॒ऽस्पृश॑म् ॥

Mantra without Swara
मन्द्रजिह्वा जुगुर्वणी होतारा दैव्या कवी। यज्ञं नो यक्षतामिमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् ॥

मन्द्रऽजिह्वा। जुगुर्वणी इति। होतारा। दैव्या। कवी। यज्ञम्। नः। यक्षताम्। इमम्। सिध्रम्। अद्य। दिविऽस्पृशम् ॥ १.१४२.८

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (अद्य) आज (मन्द्रजिह्वा) जिनकी प्रशंसित जिह्वा है वे (जुगुर्वणी) अत्यन्त उद्यमी (होतारा) ग्रहण करनेवाले (दैव्या) दिव्य गुणों में प्रसिद्ध (कवी) प्रबल प्रज्ञायुक्त अध्यापक और उपदेशक लोग (नः) हम लोगों के लिये (दिविस्पृशम्) प्रकाश में संलग्नता कराने तथा (सिध्रम्) मङ्गल करनेवाले (इमम्) इस (यज्ञम्) विद्यादि की प्राप्ति के साधक व्यवहार का (यक्षताम्) सङ्ग करते हैं, वैसे तुम भी सङ्ग करो ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन धर्मयुक्त व्यवहार के साथ परस्पर सङ्ग करते हैं, वैसे साधारण मनुष्यों को भी होना चाहिये ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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