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Rigveda Mandal 1 / Sukta 136 / Mantra 5

191 Sukta
7 Mantra
1/136/5
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यो मि॒त्राय॒ वरु॑णा॒यावि॑ध॒ज्जनो॑ऽन॒र्वाणं॒ तं परि॑ पातो॒ अंह॑सो दा॒श्वांसं॒ मर्त॒मंह॑सः। तम॑र्य॒माभि र॑क्षत्यृजू॒यन्त॒मनु॑ व्र॒तम्। उ॒क्थैर्य ए॑नोः परि॒भूष॑ति व्र॒तं स्तोमै॑रा॒भूष॑ति व्र॒तम् ॥

यः । मि॒त्राय॑ । वरु॑णाय । अवि॑धत् । जनः॑ । अ॒न॒र्वाण॑म् । तम् । परि॑ । पा॒तः॒ । अंह॑सः । दा॒श्वांस॑म् । मर्त॑म् । अंह॑सः । तम् । अ॒र्य॒मा । अ॒भि । र॒क्ष॒ति॒ । ऋ॒जु॒ऽयन्त॑म् । अनु॑ । व्र॒तम् । उ॒क्थैः । यः । ए॒नोः॒ । प॒रि॒ऽभूष॑ति । व्र॒तम् । स्तोमैः॑ । आ॒ऽभूष॑ति । व्र॒तम् ॥

Mantra without Swara
यो मित्राय वरुणायाविधज्जनोऽनर्वाणं तं परि पातो अंहसो दाश्वांसं मर्तमंहसः। तमर्यमाभि रक्षत्यृजूयन्तमनु व्रतम्। उक्थैर्य एनोः परिभूषति व्रतं स्तोमैराभूषति व्रतम् ॥

यः। मित्राय। वरुणाय। अविधत्। जनः। अनर्वाणम्। तम्। परि। पातः। अंहसः। दाश्वांसम्। मर्तम्। अंहसः। तम्। अर्यमा। अभि। रक्षति। ऋजुऽयन्तम्। अनु। व्रतम्। उक्थैः। यः। एनोः। परिऽभूषति। व्रतम्। स्तोमैः। आऽभूषति। व्रतम् ॥ १.१३६.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 5

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Meaning
हे सभासेनाधीशो ! (यः) जो (जनः) यश से प्रसिद्ध हुआ (मित्राय) सर्वोपकार करने (वरुणाय) और सबसे उत्तम स्वभाववाले मनुष्य के लिये तुम दोनों से (अविधत्) सेवा करे (तम्) उस (अनर्वाणम्) वैर आदि दोषों से रहित (मर्त्तम्) मनुष्य को (अंहसः) दुष्ट आचरण से तुम दोनों (परिपातः) सब ओर से बचाओ तथा (तम्) उस (दाश्वांसम्) विद्या देनेवाले मनुष्य को (अंहसः) पाप से बचाओ (यः) जो (अर्यमा) न्याय करनेवाला सज्जन (व्रतम्) सत्य आचरण करने और (ऋजूयन्तम्) अपने को कोमलपन चाहते हुए मनुष्य की (अभिरक्षति) सब ओर से रक्षा करता उसकी तुम दोनों (अनु) पीछे रक्षा करो जो (एनोः) इन दोनों के (उक्थैः) कहने योग्य उपदेशों से (व्रतम्) सुन्दर शील को (परिभूषति) सब ओर से सुशोभित करता वा (स्तौमैः) प्रशंसा करने योग्य व्यवहारों से (व्रतम्) सुन्दर शील को (आभूषति) अच्छे प्रकार शोभित करता, उसको सब विद्वान् निरन्तर पालें ॥ ५ ॥
Essence
विद्वान् जन जो लोग धर्म और अधर्म को जानना चाहें तथा धर्म का ग्रहण और अधर्म का त्याग करना चाहें, उनको पढ़ा और उपदेश कर विद्या और धर्म आदि शुभ गुण, कर्म और स्वभाव से सब ओर से सुशोभित करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर विद्वान् किसके लिये क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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