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Rigveda Mandal 1 / Sukta 122 / Mantra 13

191 Sukta
15 Mantra
1/122/13
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मन्दा॑महे॒ दश॑तयस्य धा॒सेर्द्विर्यत्पञ्च॒ बिभ्र॑तो॒ यन्त्यन्ना॑। किमि॒ष्टाश्व॑ इ॒ष्टर॑श्मिरे॒त ई॑शा॒नास॒स्तरु॑ष ऋञ्जते॒ नॄन् ॥

मन्दा॑महे । दश॑ऽतयस्य । धा॒सेः । द्विः । यत् । पञ्च॑ । बिभ्र॑तः । यन्ति॑ । अन्ना॑ । किम् । इ॒ष्टऽअ॑श्वः । इ॒ष्टऽर॑श्मिः । ए॒ते । ई॒शा॒नासः॑ । तरु॑षः । ऋ॒ञ्ज॒ते॒ । नॄन् ॥

Mantra without Swara
मन्दामहे दशतयस्य धासेर्द्विर्यत्पञ्च बिभ्रतो यन्त्यन्ना। किमिष्टाश्व इष्टरश्मिरेत ईशानासस्तरुष ऋञ्जते नॄन् ॥

मन्दामहे। दशऽतयस्य। धासेः। द्विः। यत्। पञ्च। बिभ्रतः। यन्ति। अन्ना। किम्। इष्टऽअश्वः। इष्टऽरश्मिः। एते। ईशानासः। तरुषः। ऋञ्जते। नॄन् ॥ १.१२२.१३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 3 Mantra » 3

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Meaning
(यत्) जो (पञ्च) पढ़ाने, उपदेश करने, पढ़ने और उपदेश सुननेवाले तथा सामान्य मनुष्य (दशतयस्य) दश प्रकार के (धासेः) विद्या सुख का धारण करनेवाले विद्वान् की विद्या को और (अन्ना) अच्छे संस्कार से सिद्ध किये हुए अन्नों को (द्विः) दो बार (यन्ति) प्राप्त होते हैं वा जो (एते) ये (ईशानासः) समर्थ (तरुषः) अविद्या अज्ञान में डुबानेवालों को (ऋञ्जते) प्रसिद्ध करते हैं उन (बिभ्रतः) विद्या सुख से सबकी पुष्टि (नॄन्) और विद्याओं की प्राप्ते करानेहारे मनुष्यों की हम लोग (मन्दामहे) स्तुति करते हैं, उनकी शिक्षा को पाकर मनुष्य (इष्टाश्वः) जिसको घोड़े प्राप्त हुए वा (इष्टरश्मिः) जिसने कला यन्त्रादिकों की किरणें जोड़ीं, ऐसा (किम्) क्या नहीं होता है ? ॥ १३ ॥
Essence
जो अच्छी शिक्षा से सबको विद्वान् करते हुए साधनों से चाहे हुए को सिद्ध करनेवाले समर्थ विद्वानों का सेवन नहीं करते, वे अभीष्ट सुख को भी नहीं प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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