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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 2

191 Sukta
25 Mantra
1/117/2
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो वा॑मश्विना॒ मन॑सो॒ जवी॑या॒न्रथ॒: स्वश्वो॒ विश॑ आ॒जिगा॑ति। येन॒ गच्छ॑थः सु॒कृतो॑ दुरो॒णं तेन॑ नरा व॒र्तिर॒स्मभ्यं॑ यातम् ॥

यः । वा॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । मन॑सः । जवी॑यान् । रथः॑ । सु॒ऽअश्वः॑ । विशः॑ । आ॒ऽजिगा॑ति । येन॑ । गच्छ॑थः । सु॒ऽकृतः॑ । दु॒रो॒णम् । तेन॑ । न॒रा॒ । व॒र्तिः । अ॒स्मभ्य॑म् । या॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
यो वामश्विना मनसो जवीयान्रथ: स्वश्वो विश आजिगाति। येन गच्छथः सुकृतो दुरोणं तेन नरा वर्तिरस्मभ्यं यातम् ॥

यः। वाम्। अश्विना। मनसः। जवीयान्। रथः। सुऽअश्वः। विशः। आऽजिगाति। येन। गच्छथः। सुऽकृतः। दुरोणम्। तेन। नरा। वर्तिः। अस्मभ्यम्। यातम् ॥ १.११७.२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 2

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Meaning
हे (नरा) न्याय की प्राप्ति करानेवाले (अश्विना) विचारशील सभा सेनाधीशो ! (यः) जो (सुकृतः) अच्छे साधनों से बनाया हुआ (स्वश्वः) जिसमें अच्छे वेगवान् बिजुली आदि पदार्थ वा घोड़े लगे हैं, वह (मनसः) विचारशील अत्यन्त वेगवान् मन से भी (जवीयान्) अधिक वेगवाला और (रथः) युद्ध की अत्यन्त क्रीड़ा करानेवाला रथ है, वह (विशः) प्रजाजनों की (आजिगाति) अच्छे प्रकार प्रशंसा कराता और (वाम्) तुम दोनों (येन) जिस रथ से (वर्त्तिः) वर्त्तमान (दुरोणम्) घर को (गच्छथः) जाते हो (तेन) उससे (अस्मभ्यम्) हम लोगों को (यातम्) प्राप्त हूजिये ॥ २ ॥
Essence
राजपुरुषों को चाहिये कि मन के समान वेगवाले, बिजुली आदि पदार्थों से युक्त, अनेक प्रकार के रथ आदि यानों को निश्चित कर प्रजाजनों को सन्तोष देवें। और जिस-जिस कर्म से प्रशंसा हो उसी-उसी का निरन्तर सेवन करें, उससे और कर्म का सेवन न करें ॥ २ ॥
Subject
फिर राजधर्म को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

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