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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 9

191 Sukta
20 Mantra
1/113/9
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उषो॒ यद॒ग्निं स॒मिधे॑ च॒कर्थ॒ वि यदाव॒श्चक्ष॑सा॒ सूर्य॑स्य। यन्मानु॑षान्य॒क्ष्यमा॑णाँ॒ अजी॑ग॒स्तद्दे॒वेषु॑ चकृषे भ॒द्रमप्न॑: ॥

उषः॑ । यत् । अ॒ग्निम् । स॒म्ऽइधे॑ । च॒कर्थ॑ । वि । यत् । आवः॑ । चक्ष॑सा । सूर्य॑स्य । यत् । मानु॑षान् । य॒क्ष्यमा॑णान् । अजी॑ग॒रिति॑ । तत् । दे॒वेषु॑ । च॒कृ॒षे॒ । भ॒द्रम् । अप्नः॑ ॥

Mantra without Swara
उषो यदग्निं समिधे चकर्थ वि यदावश्चक्षसा सूर्यस्य। यन्मानुषान्यक्ष्यमाणाँ अजीगस्तद्देवेषु चकृषे भद्रमप्न: ॥

उषः। यत्। अग्निम्। सम्ऽइधे। चकर्थ। वि। यत्। आवः। चक्षसा। सूर्यस्य। यत्। मानुषान्। यक्ष्यमाणान्। अजीगरिति। तत्। देवेषु। चकृषे। भद्रम्। अप्नः ॥ १.११३.९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 4

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Meaning
हे (उषः) प्रभात वेला के समान वर्त्तमान विदुषि स्त्रि ! (यत्) जो तू (सूर्य्यस्य) सूर्य्य के (चक्षसा) प्रकाश से (समिधे) अच्छे प्रकार प्रकाश के लिये (अग्निम्) विद्युत् अग्नि को प्रदीप्त (चकर्थ) करती है वा (यत्) जो तू दुःखों को (वि, आवः) दूर करती वा (यत्) जो तू (यक्ष्यमाणान्) यज्ञ के करनेवाले (मानुषान्) मनुष्यों को (अजीगः) प्राप्त होकर प्रसन्न करती है (तत्) सो तू (देवेषु) विद्वान् पतियों में वसकर (भद्रम्) कल्याण करनेहारे (अप्नः) सन्तानों को उत्पन्न (चकृषे) किया कर ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की संबन्धिनी प्रातःकाल की वेला सब प्राणियों के साथ संयुक्त होकर सब जीवों को सुखी करती है, वैसे सज्जन विदुषी स्त्री अपने पतियों को प्रसन्न करती हुईं उत्तम सन्तानों के उत्पन्न करने को समर्थ होती हैं, इतर दुष्ट भार्य्या वैसा काम नहीं कर सकतीं ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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